शव-यात्रा

शव-यात्रा

By | 2017-12-21T21:37:54+00:00 December 21st, 2017|Categories: आलेख|Tags: , , |0 Comments

कंधो पर जाती एक शव-यात्रा,

देती है हमे वो सच्चाई का जीता-जागता उदाहरण,

जिसे जानकर हर इंसान एक पल को वास्तविकता के उस गर्त मे,

डुबने को बाध्य हो जाता है,

जिसे हर एक को अपनाना होगा खुशी-खुशी,

आया था जिस दुनियाँ से वो,

जा रहा उसी मे विलीन होने,

पाँच तत्वो के एक-एक हिस्से को पुनः लौटाएगा वो,

जिसे माँगकर उसने अपने शरीर को पाया था,

प्रियजनो से विक्षोह और अपने समय को गुजार कर,

चल दिया अपने अगले सफर को तय करने

चिल्लाता जा रहा पूरे रास्ते,और उस चिल्लाहट मे,

न कोई आवाज और न कोई शोर,

मगर फिर भी चुप रहकर भी बहुत कुछ कहता वो निर्जीव शरीर,

लोगो ने काम-काज देखा और महसूस किया खुद का अंत,

जाना होगा उन्हे  भी सात-समदंर पार,

नत-मस्तक हो जाती कुछ पल को हमारी इंसानियत,

न साथ होती धन-संपदा और न साथ जाते उनके प्रियजन,

न सुदंर वस्त्र तन को लुभाते और न गहनो की पोटली तन की शोभा बढाती,

कुछ नही जाता साथ,जाता है तो उसके पीछे-पीछे उसका किया कर्म,

देना होगा उसे हर एक कर्मो का हिसाब,

उस दरबार मे होगी उसकी अग्नि-परीक्षा,

सफेद चादर मे लिपटा शरीर देती है कुछ गवाही,

सफेद चादर सच्चाई का प्रतिक,

मरते-मरते भी इंसानो को वो उपर वाला देता है जीवन की सही राह,

देता है उनकी पहचान और कहता है हम इंसानो से —-

गंगा से गंगोत्री तक,

पहाड़ से पढार तक,

सब मेरी माया है,

जितना अभिमान मे तपना है, तपो,

जितना बलवान बन सको, बनो,

जितना अंगरक्षक रखना है, रखो,

जब फेकुगाँ मै पासा,

हारोगे तुम बाजी,

ले जाऊगाँ तुम्हारे शरीर से आत्मा छीन कर,

और तुम्हारा अभिमान तब तुम्हे मुहँ चिढ़ाएगा,

और मै फिर एक बार तुम्हे दिखाऊगाँ,

एक “शव-यात्रा”

Comments

comments

No votes yet.
Please wait...
Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

About the Author:

Leave A Comment