माँ

माँ

By | 2017-12-24T22:18:37+00:00 December 24th, 2017|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

माँ ,तुम ही हो जननी भी
माँ ,तुम ही हो सृष्टि भी ।

अपने मातृत्व की धरती पर
लहू से अपने सींच कर
तुमने हमे आकार दिया
अपनी साँसों की गर्मी से
प्राणो का संचार किया ।

अपनी थाली के भोजन से
हमे तृप्त करने को तुमने
खुद से पहले हमे खिलाया
उदर हमारा भरने की खातिर
अपना निवाला भी तज दिया ।

ज्वर चढ़े , या बाधा कोई
मेरी पीड़ा खुद पर झेल
हर विपदा की ढाल बनी
रात- रात भर जाग के स्वयं
हमे चैन की लोरी दी ।

अपने अंश के टुकड़े को
दूजे घर मैं ब्याह दिया
मुस्कान मैं आंसू छुपा के अपने
किसी और के घर की बेटी को
अपने अंग लगा लिया ।

कभी प्रेम से, कभी डाँट कर
गुरु समान प्रखरता से
मार्ग प्रशस्त कराया है
अपने जीवन के अनुभव से
हमको सबल बनाया है ।

माँ, तुम ज्ञान की गंगा हो
जीवन के हर रूप से तुमने
परिचय हमे कराया है
दुःख और सुख में सामंजस्य
करना हमे सिखाया है ।

माँ , तुम ही हो जननी भी
माँ , तुम ही हो सृष्टि भी ।

मंजरी अग्रवाल 
1 सितम्बर 2017

 

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