लगाया दाँव पर दिल को

लगाया दाँव पर दिल को

By | 2018-01-20T17:04:22+00:00 December 25th, 2017|Categories: गीत-ग़ज़ल|Tags: , , |0 Comments

लगाया दाँव पर दिल को जुआरी है।

मगर हारा कि दिल क्या जान हारी है।

 

पयाम-ए-यार आना था, नहीं आया,

कहें किस से कि कितनी बेकरारी है।

 

झुका कर सर खड़े होना ज़रूरी सा,

जहाँ सरकार की गुजरी सवारी है।

 

कभी इक पल नज़र थी जाम पर डाली,

अभी तक मुद्दतें गुजरीं, खुमारी है।

 

तलाशें क्यों कहीं अब दूसरा दुश्मन,

हमारी जब हमीं से जंग जारी है।

 

कहा इक नासमझ ने आज ये सब से,

समझ में आ गई अब बात सारी है।

 

मुखातिब है ज़माने की हँसी से यूँ ,

कभी सहमी नहीं ईमानदारी है।

 

मेरी मौज़ूदगी में चुप खड़े थे सब,

चला आया कि फिर चर्चा हमारी है।

 

लगे कैसे नहीं तीखी ज़माने को,

अजी ये ‘सिद्ध’ की नगमा-निगारी है।

 

– ठाकुर दास ‘सिद्ध’

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