नारी और धरती

नारी और धरती

हे नारी !
तुम हो धरती के सामान .
सहनशील की पराकाष्ठ में ,
दया,करुणा ,ममता , त्याग ,
जितनी है तुम में ,नहीं उतनी पुरुष में .
हे जननी ! तुम रोपती हो फसल ,
अपनी संतान हेतु , फसल ही नहीं ,
तुम रोपती हो संसृति भी ,
और उसके साथ, कुछ सपने ,
कुछ आशाएं,.
कुछ  अरमान और कुछ उम्मीदें .
तुम्हारी निस्वार्थता की कोई पराकाष्ठा  नहीं.
क्योंकि तुम अपने लिए नहीं ,
संतान के लिए जीती हो.
हे नारी ! तुम धरती का प्राय हो .
और क्यों न हो ,
क्योंकि तुम्हारे जीवन की जड़ें ,
धरती के अमृत में दबी हैं.

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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