लौटना फिर उसी धार

लौटना फिर उसी धार

By | 2018-01-20T17:04:10+00:00 January 9th, 2018|Categories: कहानी|Tags: , , |0 Comments
मूसलाधार बारिश हो रही है।
टीन की छत पर बारिश की आवाज निरंजना को बड़ी मधुर लगती है।
पर अचानक यह क्या ? चारों ओर रेत ही रेत, रेत का समंदर, रेतीले टीले….. तैरते.तैरते थक गयी है निरंजना, पसीने से लथपथ….हठात् उठ जाती है। सामने रखी सुराही से एक गिलास गटागट पानी पीती है,  औचक देखती है कहाँ वह बारिश ?वह तो वर्किंग वुमेंस हाँस्टिल के अपने कमरे में है। नितांत एकाकी अपने घर से, पहाड़ से एकदम दूर इस रेतीले इलाके में जहाँ लाख कोशिशांे के बावजूद उसका मन रमता ही नहीें। ऐसा लगता है भीतर संवेदनाओं तक रेत ही रेत भर गयी है। कैसा जीवन है सारी दुनिया के संघर्षों से हटाकर लड़कियों के लिए एक सुरक्षित कैदखाना बना दिया गया हो जैसे।
आज संडे है। शायद घर ही बात हो जाय। यहाँ वनस्थली में तो फोन पर भी मुश्किल से बात हो पाती है, फोन लाइन हर समय व्यस्त रहती है। निरंजना का मन टूटता सा है…सोचती है कितने सुखी हैं उसके परिवार वाले, माता.पिता जो उस हरियाली , बारिश की उन बूँदों पहाड़ के अप्रतिम सौंदर्य के साये में हरदम रहते हैं।
नैनीताल बहुत याद आता है………..
निरंजना को याद आते हैं अपने पढ़ाई के दिनों के आंदोलन जिनमें उसने बढ़. चढ़ कर भाग लिया था, कैसा जोश था? लड़कियों के हॉस्टिल पर चुनाव में पराजित छात्रों के लाठी. बल्लम से हमले ही असफल कोशिशों के बाद क्रुद्ध छात्राओं की अगुआई करती जिसने न्याय मिलने तक शपथ नहीे होने देने के लिए संघर्ष किया था। उत्तराखंड आंदोलन में हिस्सा लेती निरंजना जो जेल भी जाने को तत्पर थी अपने ही भीतर कछुए की तरह इस तरह छुप गयी कि रेत और सूखे से भी डरने लगी।
निरंजना! निरंजना! तुम्हारी कोई डाक आई है उसकी सहकर्मी और मित्र मेधा ने उसे पुकारा क्या है?
शायद कोई अपॉइंटमैंट लैटर है।
निरंजना आँख मलते.मलते झटपट बाहर गयी।
आज रात भर बेचैनी के चलते अलस्सुबह ऐसी सोई कि दस बज गये और आँख नहीं खुल पाई।
क्या बात है तुम्हारी आँखें इतनी लाल क्यों है? क्या तबीयत ठीक नहीे है?ै
नहीं,  ठीक है रात ठीक से नींद नहीं आई इसलिए……..
क्यों सोचती हो इतना मैं भी तो कश्मीर से यहाँ आई हूँ मुझे भी वहाँ की बहुत याद आती है पर तुम्हारी तरह वहाँ लौटने का पागलपन मुझमें नहीं। इतनी अच्छी नौकरी क्या तुझे पहाड़ में मिल जाएगी? और मिल भी गयी तो क्या वहाँ सब कुछ ठीक ही है, सुंदर ही है? क्या तू नहीं जानती कि पहाड़ जितने सुंदर हैं उतनी ही जटिलता भी अपने भीतर समाये हुए है।
अरे छोड़! सुबह.सुबह लेक्चर देने लगी। अभी नहाकर छः गज लम्बी खादी की साड़ी भी लपेटनी है। निरंजना ने कहा और उसे छोड़ अपने रूम में आ गयी। नहाकर झटपट तैयार होकर मेस में जाकर दो ब्रैड पीस दूध के साथ निगले और कॉलेज के लिए तैयार हो गयी जहाँ उसे सबसे अधिक सुकून मिलता था। क्लास के उन तीन.चार घण्टों में वह भूल जाती थी सोच के उस बेचैनी भरे सिलसिले को, घर से उस अलगाव को जो उसे यहाँ एक पल चैन नहीेे लेने देता था।
शाम को हॉस्टिल लौटकर उसे उस लैटर की याद आई। खोलकर देखा अपाइंटमैंट लैटर था सवाई माधोपुर के लिए। उसे कोई विशेष खुशी नहीें हुई। देखकर वैसे ही रख दिया पर मन उधेड़बुन में डूब गया। यहाँ से निकलने का एक अच्छा अवसर तो मिला है पर उस और दूरदराज के इलाके में जाकर क्या करूँगी क्या पता कैसी जगह हो, कहाँ उलझ गयी, काश! पहाड़ लौटना हो पाता, काश!
नैनीताल की मालरोड उसे बहुत याद आती है। झील की सुंदरता, रात में रंग बिरंगी रोशनी ताल के पानी में लहराती हुई ऐसी लगती है मानो रोशनी ही जीवन धारण कर नृत्य कर रही हो। हरे .भरे पहाड़, जीवन से भरे .भरे……………
यहाँ रेत ही रेत पर फिर उसका मन प्रतिप्रश्न करता है रेत है तो क्या जीवन नहीं है? ये चारों ओर फैले गाँव जिनके आँगन तक रेत से भरे रहते हैं, धूप में सँवलाए हुए चेहरे रात.दिन हाड़़.तोड़ श्रम करते हैं, क्या ये जीवन नहीं?……..क्या इनके बीच जीना जीना नहीं?इनके बीच इनमें एक होकर जीने की कोशिश तो कर निरंजना…..अपने से ऊपर उठकर देख तो निरंजना! द्वंद्व से भर उठता निरंजना का मन।
अंततः निरंजना ने सवाई माधोपुर में ज्वाइन कर लिया। कॉलेज में पहला दिन, पहला प्रश्न पूछा गया क्या ब्राह्मण हो? निरंजना का मन यहीं विद्रोह कर गया बोल उठी ”ब्राह्मण हूँ या नहीं मैंने यहाँ नौकरी ज्वाइन की है इतना काफी नहीं है क्या ?” पहले दिन से ही विरोध को आमंत्रित कर निरंजना को लगा यहाँ भी नहीं रह पाएगी ।
फिर भी सारे विरोध के बावजूद उस वातावरण में रमने लगी।  पहाड़ का मोह अपनी जगह था। उन्हीं दिनों निरंजना के जीवन में आया मंथन।
जीवन में रस घुलने लगा, दोंनों एक साथ कुछ नया करने के स्वप्न देखते। छात्रों के लिए गहरे संमर्पण का ज़ज़्बा लहराने लगा मन में।
निरंजना  छात्राओं को उन बंधी. बंधाई  परंपराओं को तोड़ने को कहती जो उनकी जिन्दगी को उनके स्वप्नों को ध्वस्त कर देती हैं। कॉलेज में एक छात्रा के साथ हुई छेड़छाड़ का विरोध निरंजना ने अपने उसी आक्रामक रवैये से किया। नतीजा उसे खुद एक अध्यापक की छेड़छाड़ का सामना करना पड़ा। नकल का विरोध करने पर उसके घर पर पत्थर फेंके गये। निरंजना झुकी नहीं पर पहाड़ और शिद्दत से याद आने लगा ।
इस सबके बीच कहीं मंथन के साथ प्रेम भी आकार ले रहा था। मंथन उसका साथ देता, बदसुलूकियों के खिलाफ हर लड़ाई में मन ही मन वह निरंजना से प्रेम करने लगा था।
एक दिन उसके घर में ही मंथन ने उससे अपने मन की बात कह दी थी। निरंजना भी कहीं उससे प्रभावित थी पर वह जानती थी कि मंथन का लक्ष्य प्रशासनिक सेवा है। फिर वह जैसलमेर का रहने वाला है  मंथन को अपनाकर  वह कभी अपनी जड़ों में कभी नहीं लौट सकती उसे तो लौटना है पहाड़।
पर प्रेम का ज़ज़्बा भारी पड़ रहा था। निरंजना का मन कभी इधर ढुलकता कभी उधर। उसे लगता क्या मंथन के बिना रह भी पाएगी। फिर क्या जरूरी है कि वह पहाड़ में जा ही पाए। इन्हीं विचारों में डूबते उतराते गर्मियों की छुट्टियाँ आ गयीं। भारी मन से मंथन मिलने आया।
अच्छा तो तुमने कुछ निर्णय लिया ?
किस बात का?निरंजना ने कहा
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ निरंजना! तुमसे दूर नहीं रह पाऊँगा। फिर हमारे संकल्प, जीवन को कुछ सार्थकता देने की हमारी इच्छा……….तुम भी तो यही चाहती हो।
मैं लौटना चाहती हूँ मंथन! कहते हुए निरंजना की आँखें भर आयीं।
कैसी अनोखी जि़द है तुम्हारी प्रेम भी करती हो और स्वीकार भी नहीं करना चाहती। वे दोनों अब ओवरब्रिज पर थे। एकांत पाते ही मंथन ने निरंजना को बाहों में भर लिया।
ट्रेन चलने वाली थी। मंथन न जाने कहाँ से फूलों की एक माला ले आया और उसे निरंजना तथा अपने हाथों में बाँध कर कह उठा.“आज मैंने तुमसे विवाह कर लिया।”
ट्रेन सीटी देने लगी
मंथन उतर गया और उदास आँखों से बड़ी देर तक सूने प्लेटफॅार्म को निहारता खड़ा रहा एक धड़धड़ाती हुई मालगाड़ी के गुजरने से मंथन का ध्यान भंग हुआ।  अपने को समेट किसी तरह वह घर लौटा।
निरंजना को महसूस हुआ जैसे बहुत कुछ खो गया।
उन गर्मियों की छुट्टियों के बाद वापस आने पर मंथन को पता चला निरंजना छुट्टियों में ही बीच में आकर कॉलेज से रिलीव होकर जा चुकी थी। उसने उत्तराख्ंाड में ही बागेश्वर कॉलेज  ज्वाइन कर लिया था। मंथन स्तब्ध रह गया उसको गहरी चोट लगी बेचैनी के चलते वह एक महीने तक सवाई माधोपुर से बाहर रहा।
व्यथित निरंजना भी थी पर उसे लगा इस व्यथा को अंगीकार करके उसने बहुत कुछ पा लिया है। बागेश्वर का प्राकृतिक सौंदर्य अप्रतिम था। नदी, पर्वतीय सौंदर्य, अपनापन, सब कुछ तो था यहाँं यही तो चाहती थी वह। पर इस सबके बीच भी क्या था जो अनवरत उसके मन को मथता रहता क्या उसने संघर्षों से मुँह मोड़ा है?  मंथन हमेशा याद आता पर अब चाह कर भी मंथन से वह संपर्क नहीं कर पाती कोई अपराधबोध अंदर ही अंदर सालता।
नई जगह नया परिवेश। निरंजना को लगा उसे जीने का मकसद मिल गया छोटा कॉलेज था पर आम दूरस्थ महाविद्यालयों की अपेक्षा अच्छी खासी बिल्डिंग थी। आधे से अधिक अध्यापक नये सलैक्शन से आये थे। सब उत्साह और उमंग से भरे हुए। निरंजना भी नए उत्साह से अपने कार्य में जुट गयी।
पर अचानक कॉलेज का माहौल बदलने लगा। मामला दो अध्यापकों की आपसी तनातनी से शुरू हुआ । वैभव जोशी और रोमषा शर्मा। वैभव जोशी को लगता था कि रोमषा शर्मा और प्राचार्य दोंनों ही कॉलेज प्रशासन पर अपनी सारी पकड़ बनाए हुए हैं जिसके चलते और अध्यापकों की आवाज दब जाती है। एक दिन वैभव जोशी ने रोमषा शर्मा और प्राचार्य के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाया। इसके बाद कॉलेज स्पष्ट रूप से दो गुटों में बँट गया। माहौल इतना खराब हुआ कि अध्यापकों की रूचि शिक्षण से अधिक राजनीति में रमने लगी।
निरंजना फिर उलझ गयी थी। एक दिन अपने ही एक सहकर्मी से बातों के दौरान जब उसने कहा कि यह सब होगा तो हम इस यहाँ के लिए क्या कर पाएँगे तो वह विद्रूप स्वर में बोला क्या रखा है यहाँ ? एक आध साल कट जाए तब कोई जुगाड़ देखकर यहाँ से ट्रांसफर करवाना होगा।इस पहाड़ में कौन जिंदगी भर रह सकता है?न कोई मैडिकल फैसिलिटी न बच्चों की पढ़ाई की सुविधा।
निरंजना ने कहा यहाँ भी तो लोग रहते हैं और हम जो वेतन ले रहे हैं केवल अपने लिए सुविधाएँ जुटाने को ही तो नहीें न हमारी भी तो कुछ जिम्मेदारियाँ हैं।
अभी आप अकेली हैं मैडम! जब घर परिवार हो जाएगा तब आपको पहाड़ की विराट कठिनाइयाँ समझ में आएँगी। डॉ रजत ने कहा।
मैं ऐसा नहीे सोचती निरंजना बोली।
उन्हंीे गर्मियों में निरंजना ने माता .पिता के जोर देने पर उनके पसंद के और अपने बचपन के मित्र  से विवाह कर लिया। निरंजना के लिए वे उलझन भरे दिन थे। पर उसे इस बात की संतुष्टि थी कि उसने जो सपने देखे हैं उन्हैं वह पूरा कर सकती है। इस दौरान उसे लगा था कि पहाड़ और पहाड़वासी बहुत अकेले हैं। पर स्टाफरूम में प्राध्यापकों के बीच बातचीत का मुख्य मुद्दा या तो ट्रांसफर होता या पे स्केल। ऐसा लगता था जैसे उन्होंने पहाड़ पर ज्वाइन करके सरकार पर अहसान किया हैै और येन केन प्रकारेण साम, दाम, दण्ड, भेद अपनाकर फुटहिल के महाविद्यालय में चले जाना चाहते हैं।
निरंजना ये बातें सुन. सुन कर कई बार स्वयं को अपराधी महसूूस करती। वह भी तो भागी थी राजस्थान से। इनमें और उसमें क्या अंतर है? क्या हम सब भाग रहे हैं केवल अपनी सुख .सुविधाओं के लिए किसी न किसी बहाने को लेकर निरंतर…. पल……. प्रतिपल……
स्वप्न देखती है निरंजना भाग रही है। भागते. भागते नदी में गिर पड़ती है नदी की तेज धार उसे अपनी चपेट में ले लेती है और वह बह जाती है बह कर उतरती है एक सजे धजे स्थान में और वहीें बस जाती है पीछे छूट जाता है पहाड़ एकाकी, पहाड़ सी समस्याओं के साथ….
उन्हीं गर्मियों में जब महाविद्यालय अवकाश के बाद खुला तो लगभग चार.पाँच लोगों का तबादला हो चुका था चौबीस लोगों के स्टाफ में मात्र अठारह उन्नीस लोग रह गये थे क्योंकि रिक्त पदों हेतु स्थानान्तरण का कोई आदेश नहीं था। अधिकांश विषय ऐसे थे जिनमें एक.एक अध्यापक थे अब वे खाली थे। छात्र पूछते अब हमारी क्लास कौन लेगा सर ?
प्राचार्य उत्तर देते हम भी क्या करें अब जब तक कोई नये प्राध्यापक नहीं आते आप लोगों की क्लासेज नहीं होंगी।
छात्रों ने कहा हम आंदोलन करेंगे। महाविद्यालय का अध्यक्ष नशे में धुत अपने साथियों के साथप्राचार्य कक्ष में घुस आया….
क्या नाटक है सर यह सब ? स्टुडैंस के साथ लगातार खिलवाड़ हो रहा है। सब अपनी.अपनी  गोटी फिट करने मे लगे हैं छात्रों के भविष्य की किसी को परवाह ही नहीं है। अब सीधे . सीधे चक्का जाम होगा।
जानते थे प्राचार्य ये सब गीदड़ भभकियाँ हैं। जब तक छात्रसंघ के चुनाव नहीं निपट जाते तब तक छात्रों को बहला कर वोट लेने के लिए ये अच्छे हथकण्डे थे। वे स्वयं इस इंतजार में थे कि कि कोई अच्छा सा जुगाड़ बने और वे किसी सुविधाजनक स्थान पर चले जाएँ।
कुछ दिनों तक लगातार चक्का जाम हुआ। छात्रों का जबरदस्त आंदोलन चला। कागजों पर कुछ समझौते हुए। चुनाव निपटा“सब अपने . अपने काम पर लगे“
निरंजना ने छात्रों को समझाने का प्रयास किया“ तुम्हें अपने अधिकारों के लिए वास्तव में लड़ना होगा केवल छात्रसंघ चुनाव को आधार बनाओगे तो तुममें और अवसरवादी राजनेताओं में क्या फर्क रह जाएगा ?” कुछ छात्र सहमत लगे कुछ का प्रत्युत्तर था…..
”अभी तो आप बड़ी.बड़ी बातें कर रहीं हैं कल को खुद आप  यहाँ नहीे रहना चाहेंगी। सब अपना ही तो सोच रहे हैं मैडम फिर हमीं क्यों शहीद बनें। हम भी यहाँ से जाना ही चाहते हैं पहाड़ में अब रखा ही क्या है?”
वास्तव में साल भर बीतते न बीतते निरंजना का तबादला जोशीमठ  हो गया जहाँ उसके पति कार्यरत थे। बरसात के दिन निरंजना को रिलीव होकर जोशीमठ जाना था। प्रचंड बरसात के कारण सारे रास्ते टूटे हुए थे। थराली से आगे हरमनी में जबरदस्त ब्लॉक था। नीचे बहती पिंडर और 25-30 मी0 ऊपर हरमनी, 12-13 किलोमीटर का रास्ता हरमनी से नारायणबगड़ तक पैदल पार करना निरंजना पसीने . पसीने हो उठी।
देखा एक सात . आठ महीने की गर्भवती पहाड़ी औरत सर पर अपना सामान एवं अगल . बगल में दो बच्चों को सँभालते हुए थकी बोझिल किसी तरह उस लम्बे रास्ते को पार करती जा रही है।
निरंजना को लगा कैसी विकट जिजीविषा है? और एक वह कहाँ से कहाँ भागती जा रही है, समझौते करती जा रही है।
जोशीमठ पहुँच कर निरंजना को बहुत खुशी हुई। बाँज और बुराँस, देवदार,  स्प्रूस, साइप्रस, के पेड़, सुदूर दीखतीं नंदादेवी, गौरीपर्वत इत्यादि की हिमाच्छादित चोटियाँ लगा मनचाहा जीवन मिल गया।
कुछ वर्ष गुजरे। छात्रों के प्रति पूर्ण समर्पित निरंजना ने उस परिवेश और पहाड़ी महिलाओं के साथ जुड़कर कई कार्य किए। लेकिन जैसे .जैसे समय बीत रहा था साल दर साल महाविद्यालय में स्टाफ की कमी होती जा रही थी। पहाड़ के इन महाविद्यालयों, चिकित्सालयों और विभिन्न सरकारी संस्थानों की विडंबना ही यही थी कि कि वहाँ कोई अध्यापक, चिकित्सक और सरकारी कर्मचारी टिकता ही नहीं था। यहाँ तक कि स्वयं वे कर्मचारी भी वहाँ नहीं रहना चाहते थे जिनके वहाँ घर थे, बचपन वहीं बीता था। रह जाते थे वही बचे खुचे जिनकी कहीं पहुँच नहीं थी।
निरंजना के पति विवेक आठ नौ वर्षौं से जोशीमठ में ही थे और संतुष्ट थे वे इंजीनियर थे अब उनका तबादला अवश्यंभावी था। निरंजना के महाविद्यालय में अधिकांश लोग वे थे जो फुटहिल में जाने की प्रतीक्षा में दिन काट रहे थे ऐसा लगता था कि वे पहाड़ के नहीं किसी नारकीय जगह में फँस गये हैं जहाँ से निकलना ही मानो उनकी मुक्ति हो।
उन्हीं दिनों पहाड़ की तलहटी के किसी महाविद्यालय से न जाने कैसे एक प्राध्यापक का ट्रांसफर जोशीमठ हो गया नमिता साह जो कि ऊधमसिंह नगर में कार्यरत थी। आते साथ निरंजना से पहला संवाद हुआ “ आप यहाँ कब से हैं?“
सात साल से
सात साल!
बड़ा जीवट है आपमें मैं तो यहाँ चार दिन न टिक पाऊँ। कोशिश कर रहे हैं कि जल्दी से जल्दी वापस चले जाएँ। ट्रांसफर न सही अटैचमैंट ही हो जाए। यहाँ है क्या न तो कोई सुविधाएँ न बच्चों के अच्छे स्कूल और तो और शॉेपिंग के लिए भी कोई अच्छी जगह नहीं। इस पहाड़ में हवा के सिवाय रखा ही क्या है? कभी बीमार पड़ जाएँ तो डॉक्टर भी नसीब न हो। किसलिए यहाँ डटी हुई हैं कल को आपका बेटा बड़ा होगा बेसिक एजुकेशन अच्छी होगी तभी तो भविष्य भी बनेगा प्रयास क्यों नहीं करते आप लोग।
यहाँ भी तो बच्चे पढ़ रहे हैं और बीमार यहाँ जो रह रहे वे भी पड़ते हैं उनका भी तो इलाज होता ही है। निरंजना ने कहा।
नमिता साह का उत्तर था देखिए ज्यादा भावनाओं में उलझना ठीक नहीं कौनसा जिंदगी भर का ठेका लिया है आपने?
उस साल भयंकर बारिश हुई। जगह.जगह भूस्खलन के कारण पूरी सड़क बंद हो गयी यहाँ तक कि दूध, फल, सब्जी और जरूरत की वस्तुएँ तक मिलना कठिन हो गया उन्हीं दिनो निरंजना के पति को हार्ट अटैक पड़ा और शहर में डॉक्टर के मौजूद न होने के कारण ई सी जी भी नहीं हीे पाया। खैर किसी तरह गाड़ी से देहरादून की ओर चले तो थोड़ा आगे टंगणी में 12-13 किमी0 लम्बा मार्ग टूटा हुआ था एक ओर खड़ा पहाड़ दूसरी ओर बहती प्रचंड नदी,  भूस्खलन के मलबे से भरी थोड़ी सी बची सड़क पर कतारों में खड़ी गाड़ियाँ और ऊपर से लगातार गिरते पत्थर ……….सब कुछ कितना भयावह………साक्षात मौत सामने ………….. एक.एक पल उधार का …………………..
पहाड़ के सौंदर्य से अभिभूत निरंजना भयार्त नेत्रों से देख रही थी पहाड़ की विडम्बना को।
वहीं कश्मीर में शहीद किसी आर्मी वाले का शव जाना था उसके लिए आर्मी के जवानों के प्रयास से रातों .रात सड़क खोली गयी रात भर  भय ,संशय और प्राण रक्षा का प्रश्न बना रहा गाड़ियों की लम्बी कतारें दूर.दूर तक फैली हुईं थीं। नदी की भयंकर गर्जना भय के इस साम्राज्य का विस्तार कर रहीं थी। किसी तरह रात कटी। सुबह सड़क साफ हुई निरंजना पराजित हीे गयी, पराजित हो गया उसका संकल्प। अगले वर्ष प्रयास करके स्वास्थ्य के आधार पर निरंजना एवं उसके पति ने अपना ट्रांसफर हल्द्वानी करा लिया।
लेकिन वह गर्भवती पहाड़ी औरत अपने दो बच्चों एवं सामान के साथ भूस्खलन वाले लम्बे रास्ते को पार करती हुई निरंजना को आज भी याद आती है और उस शहीद जवान की स्मृति हो आती है तो याद आता है अपना संकल्प और लज्जित होती है वह अपने पलायन पर…..
निरंजना का सत्य यही है और पहाड़ का भी। पर क्या पहाड़ की नियति यही है। क्या निरंजना फिर  लौटेगी उसी धार?
– कल्पना पंत

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