हुल के फूल

हुल के फूल

By | 2018-01-20T17:04:08+00:00 January 12th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

हुल के फूल

घिरे चारदिवारी के अंदर
खिलते नहीं है
वह तो
तुम्हारे और मेरे हृदय में भी खिल सकता हैं
जब तुम्हारे
आँखो के सामने
लोगों पर अत्याचार होता हैं
तुम्हारे पत्नी और बेटी को
उठा कर ले जाते है
कुछ बुरा सोचकर……
पहाड़ -पर्वत, नदि -नाला
और घर -दुवार से भी
तुम्हे बेदखल होना पड़े

तुम्हारे धन देोलत
लुट लेगें
विचार और सोच पर भी
फुल स्टोप लगायेगें
तब
अपने आप
देह का खून
गर्म हो जायेगा
नरम हथेली भी
कोठर मुट्ठी मे बदल जायेगा
कंघी किया सर का बाल भी
खड़े हो जायेगा
और मुंह से जोर
आवाज निकल जायेगी ___
हुल, हुल, हुल
तब तुम्हारे चट्टानी ह्रदय मे
हुल का फूल खिलेगा.

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