नवगीत

नवगीत

By | 2018-01-20T17:04:06+00:00 January 17th, 2018|Categories: अन्य, गीत-ग़ज़ल|Tags: , , |0 Comments

नवगीत– “मकर संक्रांति ”

चिड़िया उड़ आ बैठी अँगना
मांग रही खिचड़ी।
तिल गुड़ लइया की सोंधी सी
देख रही तिकड़ी।

हरियाणा पंजाब मनाते
लोहड़ी का त्यौहार
समर्पित करते अग्नि देव को
तिलचौली आहार।
थिरक रहा बाजे के संग में
प्रमुदित पारावार
है फसल कटने बोने का
ये उल्लासित आधार

धू-धू करते जलती है
धमक दिखाती लकड़ी।
तिल गुड़ लइया की सोंधी सी
देख रही तिकड़ी।।

पोंगल का उत्सव मना रहा
तमिलनाडु का अंचल
आंगन में चूल्हे पर चढ़ता
है मिट्टी का बर्तन
गुड़ चावल की खीर पकाती
इतराती है कलछल
नए धान की फसल काटकर
कूट गया है चावल

सूर्य देव को भोग लगाने
को श्रद्धा उमड़ी।
तिल गुड़ लइया की सोंधी सी
देख रही तिकड़ी।।

संक्रांति मकर में करता है
उदगयन हो सूरज।
तिल तिल कर के बढ़ता है दिन
शीत तजे रख धीरज।
शुभ तिथि है पावन विधान
वैदिक उत्सव का तीरथ।
जुड़ा है यह त्यौहार प्रकृति से
खिलता मन का नीरज।

सुरभित जनमानस मति है
क्या अगड़ी क्या पिछड़ी।
तिल गुड़ लइया की सोंधी सी
देख रही तिकड़ी।

“लाल लोही” सिंध में है
“खिचड़ी” बिहार यूपी में।
रफ्तार थम मोहलत मिल
जाती दौड़ा धूपी में।
दही चूड़ा लक्ठा लइया
तिल का लड्डू सूची में
संदेशों के ताँता मे
समां गा रहा सूफी में।

पका रही पकवान रसोई
मे गाकर गृहणी।
तिल गुड़ लइया की सोंधी सी
देख रही तिकड़ी।।

फसल कटने का त्योहारी
सीजन आसामी बिहू।
ढोल बांसुरी संग नर्तन
करता “भोगाली” बिहू।
करे फसल बुवाई संग
“हुचारी” “रोंगाली” बिहू।
दिया खलिहानों तुलसी में
जलाए “कोंगाली” बिहू।

आग के चहुँओर घुमड़ी
नृत्य कर रही टुकड़ी।
तिल गुड़ लइया की सोंधी सी
देख रही तिकड़ी।।

@सुनीता सिंह (14-1-2018)

(तिलचौली –तिल गुड़ चावल भुने मक्के की आहुति;
प्रमुदित पारावार –प्रसन्नता का सागर; उदगयन -उत्तरायण; नीरज –कमल; हुचारी –असम का बिहू के अवसर का लोकगीत व लोकनृत्य; बिहू के तीन प्रकार –रोंगाली, कोंगाली, भोगाली;)

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