जी चाहता है

जी चाहता है

By | 2018-01-25T22:09:13+00:00 January 25th, 2018|Categories: कविता, बचपन|Tags: , , |0 Comments

कैसे कहूं क्या चाहे मेरा मन
लोग कहेंगे इसे पागलपन
जब याद करती हूं गुज़रा जमाना ,
तो मन खींच ले जाता है वही
और चाहता है वो सब दोहराना।
बहुत याद आता है गुज़रा जमाना।
जी तो चाहता है सखियों को बुलाऊं,
एक बार फिर से सब छत पर चढ जाएं ,
वो रस्सी पुरानी कहीं से ढून्ढ लायें ।
और कूदें कुदायें धमाल मचायें,
जी तो चाहता है एक बार फिर से
खेतों की मेंडों पर दौड़ लगायें,
पड़ोसी के पेड़ों से  अमरूद चुरायें ,
और माली के आने पे दौड़ लगायें ।
वो तितली पकड़ने को दम साध जायें ,
और तितली को पकड़े सभी को दिखाये ।
जी तो यह चाहे कि भरी दोपहर में ,
घर के जीनों में गुड़िया से खेलें ,
भाई बहन और सखियों के संग में
मेले में जायें हिंडोले पे झूलें ।

सखियों की टोली और चूरन की गोली,
भला कैसे भूलें बातें वो भोली ।
जी तो यह चाहे वे दिन लौट आएँ
मगर जानती हूं कभी यह न होना ,
मन चाह्ता है वो दिन लौट आयें
कभी फिर न जायें ,

कहीं फिर ना जायें ।

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About the Author:

बीस वर्षों तक हिन्दी अध्यापन किया । अध्यापन के साथ शौकिया तौर पर थोडा बहुत लेखन कार्य भी करती रही । उझे सामजिक और पारिवारिक इश्यों पर कविता कहानी लेख आदि लिखना बेहद पसन्द है।

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