बचपन के दिन भी क्या दिन थे

बचपन के दिन भी क्या दिन थे

बचपन के दिन भी क्या दिन थे!

ना चिंता, ना कोई तनाव,

ना तो ढेर सारी ख्वायिशें,

ना ही बेशुमार अरमान।

बस कुछ कहानी की पुस्तकें,

एक प्यारी से सलोनी सी गुडिया,

और एक कागज़ की नाव।

ढेर सारा प्यार करने वाले माता-पिता,

नाज़ उठाने वाले दादा -नाना,

परियों की कहानियां सुनाने वाली दादी-नानी,

बहिन -भाईयों से  भरा-पूरा संसार।

सारे जहाँ से प्यारी थी यह प्यार और ममता की छाँव .

जहाँ पल में रूठना, और पल में मान जाना,

एक दूजे से शरारतें करके, कहीं छुप जाना।

वोह-नोक-झोंक, वोह चिड़ना -चिड़ाना बहुत याद आये,

कसम से क्या दिन थे वोह बचपन के,

अनेक खुबसूरत भावों मे गुंथे सतरंगी रिश्तों  का गाँव।

सच्चाई, समर्पण व करुणा और प्यार   से भरे रिश्ते,

और मासूमियत से भरा भोला, निष्कपट, कोमल मन।

चंद तारीफों से, बस एक मुस्कान से, और कभी छोटा सा इनाम

पाकर ही खुश हो जाने वाला बचपन।

हमने जीया सबसे संतुष्ट और खुशहाल बचपन।

हाय! बहुत याद आते है हमें हमारा बचपन

कितने हसीं थे वोह बचपन के दिन।

Comments

comments

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 4
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    4
    Shares
संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

Leave A Comment