समय है चिंतन का

समय है चिंतन का

By | 2018-02-03T12:10:09+00:00 February 3rd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

जब सन्नाटों में शोर लगे
जब धरती पर रहना बोझ लगे
जब लगे की नफरत भारी है
मोहब्बत में बड़ी लाचारी है
तब समझो की हम इंसान नहीं
हममे बचा अब इमां नहीं
जब अपना ही घर अंजान लगे
ना घर से निकलना आसान लगे
जब हर नजर से दिल डरने लगे
हर रिश्ते से जी भरने लगे
तब समझो कुछ बुरा सा है
संस्कारों में कुछ अधूरा सा है
जब मासूम आँखों में ख़ौफ़ दिखाई दे
जब उनका डर ना हमें सुनाई दे
जब बच्चो से बचपन छिनने लगे
वो कुछ कहने से झिझकने लगे
तब समझो हमसे हुयी कोई भूल है
या हम कहीं और ही मशगूल हैं
जब इंसानियत मरती दिखाई दे
मौत में हंसी के शोर सुनाई दे
जब पिता का दिल रोज रोता हो
बेटे को माँ के अश्क ना दिखाई दे
तब समझो समाज गिर रहा है
भविष्य अंधेरों से घिर रहा है
जब पैसो की खनक इतनी भारी हो
की इंसान बीमारी लगने लगे
जब देश को आज़ाद कराने वाले
एक काल्पनिक कहानी लगने लगें
तब समझो इंसान पतन को है
देश भी अपने अंत को है
जब इस सदी में आकर भी
लोग पाखंडियो को पूजने लगे
उन ढोंगी साधुओं के लिए
अपनी जान भी हाजिर करने लगे
तब समझो लोगों में कैसा ज्ञान है
और कहते हमारा भारत महान है
जब ऐसी बातें मन में आने लगे
देश की चिंता सताने लगे
तब समझो
समझने का वक़्त गया
कुछ करने का वक़्त हो आया है
हमारे ही हाथ हमारा भविष्य है
उसे महफूज़ करने का वक़्त हो आया है
इससे भी बुरा ना हो जाए कहीं
अब सब सँवारने का वक़्त हो आया है

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प्राध्यापक(हिंदी साहित्य)

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