खोया हुआ सा बचपन

खोया हुआ सा बचपन

By | 2018-02-04T12:57:26+00:00 February 4th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

बच्चे तो हैं, पर बचपन कहाँ है?
वो मासूमियत, वो रौनक कहाँ है?
वो खेल, वो खिलौने कहाँ है?
वो मस्ती और वो मौज कहाँ है?
उलझ सा गया है बचपन….
उठ कर पढ़ना, पढ़ कर सोना
किताबों की दुनिया में हर वक़्त खोना
वो नजर, वो प्यार कहाँ है?
वो आँसू, वो मुस्कान कहाँ है?
बिखर सा गया है बचपन….
कम्प्यूटर, मोबाईल, टीवी चलाना
इन्हीं के खेलों में खो जाना
वो रूठना, वो मनाना कहाँ है?
हर शाम का वो अफसाना कहाँ है?
सिमट सा गया है बचपन….
वो बारिश में भीगना
वो मिट्टी में खेलना
वो पड़ोस के हर घर में
अपनी हंसी बिखेरना
अब वो मंज़र, वो बात कहाँ है?
वो नन्हे क़दमों की आवाज कहाँ है?
अब तो बस एक होड़ लगी है
सबसे आगे निकलने की
इस दौर में,
इस दौड़ में,
खो सा गया है बचपन….

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प्राध्यापक(हिंदी साहित्य)

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