क्षणिकाएं

क्षणिकाएं

By | 2018-02-06T15:56:32+00:00 February 6th, 2018|Categories: विचार|Tags: , , |0 Comments

उम्र  यूँ  आई
कुछ उनके  हिस्से में
जरा-सी मेरे हिस्से  में
बाकी  गंवा दी हमनें
जमाने  को समझने  में  ।

(2)

तराजू में  तोलना
जरा
मुश्किल  सा था
मगर
तब तोला तो
पड़ला
परायों का
भारी
सा ही निकला

(3)

मिनतें बहुत  की हमनें
उनकों मनाने  की
हमारे सर झूकाने को
जिन्होंने  हमारी
बूझदिली  समझी

(4)
अब रास नहीं  आता
ऑंसू बहाना भी
लोग उनसे  भी
अपने  अरमान
सिंचते है

(5)

घर के  कोने कोने
में
जवानी  अकड़ी सी
फिरती है
जब बेकार ही
गंवाया
मुझको  तो
अब
ढुंढते हो क्यों ।

(6)

इरादे  भी कभी
पत्थर  से
हुआ  करते थे
अब टुट  जातें है
सूखी टहनियों  से ।

(7)

हम छिन लाते थे
अपने  हक की रोटियाँ
अब चबाने से भी  जिनकों
कतराने लगे हैं  हम

(8)

दुखती रग हमारे
उसूल होते थे कभी
अब सुनता नहीं  है  कोई
बात हक की भी ।

(9)

कभी मासूम समझते थे
जिनको वो अब जोर चलाते है
बूजूर्गो  की उम्र  का भी कहाँ
लिहाज  करते हैं

(10)

जमाना वो भी  अच्छा  था
जमाना भे भी अच्छा  है
जमाना अच्छा  ही आऐगा
पर पीढ़ियों की दूरी पाट न पाएगा ।

(11)

पी लिया करते  थे  हम पानी
कभी दो दो हथेलियों  से
अब चूलू भर पानी के भी
पैसे चूकाने पड़ते है ।

(12)

कुएँ की मेड  पर  बेठकर
हजारों मटकीयां भरते थे जो
अब बूंदो  को तरसते है वो
दरिया  में  बेठ कर ।

(13)

बहुत अनपढ़  रही
पढने में  रिश्तों  को
अब लगता  है  कई
जमातें पास करली है  मैनें ।

(14)

वो हंस  दिय़ा करते थे
जब भी मुश्किलों में  पड़ती थी
जब सिख लिया  मुश्किलों  से
लड़ना तो
रोते हुए  चहरे  दिखने लगे सबके ।

(15)

कुतर ते थे जो मेरे घावों को
अपनी बातों  से वो हरदम
अब हमदर्दी का लेप
चढाते है  उन पर ।

(16)

छिड़का करते  थे वो
जख़्मों पर भर-भर
कर जो नमक
अब शहद से
नहलातें है  हरदम

(17)

मैं आज भी  सबको
अपना समझती हूँ
पर दिल के रास्ते का
एक दरवाजा  बंद
कर दिया मैंने ।

(18)

अब शर्त यही रहती है
मेरे दिल  तक पहुंचने की
मकारी से भरा हुआ मन
दरवाजे पर ही उतार आना तुम ।

(19)

नहीं  लगती है  अब
मुझको  ये रफ्तार  अच्छी  सी
मेरे माथे की सिलवटों को
बहुत बढा देती है।

(20

लगा करती थी आंधियाँ  भी
कभी सखी सहेलियों   सी
अब हवाओं से बात करना भी
गवारा है नहीं हमको ।

(21)

जो धुल मिट्टी भी कभी
चूभती नहीं  थी आंखों में
अब सूरज  की  किरणें  भी
दुश्मन सी लगती है ।

(22)

उम्र  का देखो ये कैसा
मोड़ आया है
हंसी भी अब दांतों  सी
खोखली  सी लगती है ।

(23)

बूझते चरागों की जैसे
लो मचलती है
सांसें  भी  जब चाहे
रास्ता बदलती है ।

(24)

बहारों  के  सारे
इरादे  भी बदल गए  हैं अब
पतझड़  जो सारे
चमन में  उतर गए  हैं  ।

(25)

सोचा नथा ऐसी
कभी रात आएगी
मन अंधेरों के साए सा
लिपटा हुआ  होगा  ।

(26)

ज़वानी में हम बनें
हर एक का सहारा
अब वक़्त  आया  जो
सहारा लेने का
दरारें  रिश्तों  में
गहरी  पड़ी मिली मुझको।

(27)

बाहर  अपनी  पहचान  बनाने  में
खुद की पहचान   खोता हुआ  आदमी
भीड़  जुटाने  के खयाल  से
सब से अकेला  होता हुआ  आदमी

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