ना रहे मन के सच्चे यह बच्चे

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ना रहे मन के सच्चे यह बच्चे

कभी हुआ करते थे  बच्चे मन के सच्चे,

मगर अब ना रहे बच्चे मन के सच्चे,

अब ना रही वोह  मासूमियत,

और ना ही रहा वोह भोलापन।

वोह  निश्छलता, निष्कपटता  भी ना रही ।

वोह  प्यारा सा खिलता फूल सा चेहरा भी ना रहा,

जो बरबस  बेगाने को भी अपना बना लेता।

किसी  कठोर ह्रदय को भी मोम सा पिघला देता।

दिल तो मालूम नहीं है या नहीं  अब।

जब दिल नहीं तो जज़्बात भी कहाँ होंगे।

सब मर गए जैसे।

अब इनमें भी  है बड़ों सी बुराईयाँ।

छल-कपट , धोखाघड़ी ,  बैर भाव, हिंसा ,  काम ,क्रोध ,मद ,लोभ।

ना  जाने कैसी-कैसी दुर्भावनाएं और क्षोभ।

पहले  कभी थी  छोटी-छोटी मासूम नादानियाँ,शरारतें।

मगर  अब  हो गयी इनकी बुध्धि  कुत्सित और विकार-ग्रस्त।

अब यह  शरारतें नहीं  गुनाह करते हैं।

अमानवीयता में यह बड़ों से आगे निकल चुके हैं।

बड़े-बुजुर्गों,अभिभावकों और गुरुजनों का अपमान,  तिरस्कार,

उनकी  विचारों, रहन-सहन और  आदर्शों को धता बताने वाले

यह नयी पीड़ी केबच्चों के लिए आम बात है ,

बात-बात पर इनका मजाक  उड़ाना।

उनके प्रति अपने फ़र्ज़ से कन्नी काटना।

अपशब्द  कहना तो इनके लिए आम बात है।

यदि  विरोध किया तो  .. सावधान ! हाथ भी उठा सके हैं यहआप पर।

हाथ तो क्या  !   खंजर भी उठा सकते हैं आप पर।

ना  जाने   इनके इस भटकाव, संस्कार हीनता के पीछे क्या राज़ है,

मगर हम तो यही जाने।

हमें इनमें अब  अपने भविष्य की रौशनी नहीं  दिखती।

नए उज्ज्वल भारत की तस्वीर  भी इनमें नहीं  दिखती।

फसल ख़राब हो गए   यह नयी पीड़ी की।

मेरे  देश की  किस्मत अब  अंधेरों मेंखो गयी।

इसकी ज़िम्मेदारी उठाने को भी  कोई  तैयार नहीं।

मगर अपने गिरेबान नहीं देखेंगे।

और  दोष भी देंगे।

के बच्चे  अब मन के सच्चे ना रहे।

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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