अवतार लो हे विराट

अवतार लो हे विराट

By | 2018-02-09T23:49:48+00:00 February 9th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

इस धरती पर हे कर्मयोगी,अब तुम्हारी जरूरत है
गीता के ज्ञान को जानकर भी
मनुष्य दिगभ्रमित हो रहा
चांद को छूने की चाहत मे
रसातल मे खो रहा
दुर्योधन तो चंहु ओर है
अर्जुन लोप हो रहा
इस धरती————
समय की पुकार है अब यही
सृष्टि के रथ को सम्भालो सारथी
मन वचन कर्म से
मानव भ्रष्ट हो रहा
अवतार लो हे विराट
इस धरती——+-+

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