बलात्कारी: समाज पर कलंक

बलात्कारी: समाज पर कलंक

By | 2018-02-11T10:32:06+00:00 February 11th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |2 Comments

तुम्हें आदमी कहूँ अगर
तो आदमी शब्द की ये तौहीन है
तुम्हे जानवर भी क्यों कहूँ
वो भी तुमसे तो बेहतरीन है
तुम्हे राक्षस भी कहूँ अगर
तो रावण का भी तुममे अंश नहीं
सीता की आज्ञा नहीं थी इसलिए
उसने किया उन्हें कभी स्पर्श नहीं
तुम्हें कहूँ अगर विषैला नाग
तुम तो उसके भी लायक नहीं
एक बार में हर लेता है प्राण
पर देता ज़िन्दगी भर का गम नहीं
कलंक हो तुम उस परिवार का
जिस परिवार ने तुमको पाला है
अपनी माँ के प्यार, संस्कारों का
तुमने क्या खूब क़र्ज़ उतारा है
एक बलात्कारी की माँ कहलाये
इस से अच्छा तो मर जाना है
नही तो बेटे की दी सौगात का
सारी जिंदगी ही बोझ उठाना है
माँ है ये एक दुष्कर्मी की
ये ही बन जाती उसकी पहचान है
उसका बस ये ही दोष है कि
तुमसे जुड़ा उसका नाम है
जो भी हो
सच ये है कि
तुम से लोग
किसी पहचान के हकदार नहीं
ना कोई तुम्हारा धर्म है
है थोड़ा भी ईमान नहीं
ना तुम्हारा कोई नाम है
है तुमसा कोई बदनाम नहीं
क्या पहचान दूँ मै तुम्हें
इस समाज ही क्या
इस दुनिया में ही
है तुमसा कोई हैवान नहीं

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प्राध्यापक(हिंदी साहित्य)

2 Comments

  1. ओनिका सेतिया 'अनु' February 12, 2018 at 12:31 pm

    बेहद सत्य व् सटीक रचना .

    Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
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  2. माधुरी शर्मा (मधु) February 13, 2018 at 8:00 am

    धन्यवाद

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