बार गर्ल

बार गर्ल

By | 2018-02-11T23:57:08+00:00 February 11th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |1 Comment

** बार: बार-बार देह व्यापार**

 

मायानगरी मुंबई की

बार गर्ल की यह कहानी है ।

कूल्हे मटकाती, देह दिखलाती

भड़कीली साड़ी के संग

अस्त-व्यस्त पल्लू है हटाती ।

लुटे हुए नोटों के ऊपर

नाच रोज़ दिखलाती है ।

पिंजरे में रहती यह बंद

असमत को लुटवाती है ।

 

यही कहानी रोज रात को

बार गर्ल लिख जाती है ।

कुछ पैसों की खातिर यह

ग्राहक के संग रात बिताती है ।

राधा, शीला, मीना, रानो,

लता नाम बतलाती है ।

नया मुखौटा नया नाम

रोज़ नया बताती है ।

 

रोज़ की यही ज़िंदगी इसकी

नासूर रोज़ दे जाती है ।

काम की खोज में पराए देश

रोज़ लुटी यह जाती है ।

मात-पिता को भ्रम यह रहता

नौकरी बेटी करती है ।

पर यह उनको कौन कहे कि

देह व्यापार वह करती है ।

 

लाचारी और दीन हीनता

उसको यह दिखलाती है ।

कह ना पाती सह जाती

परिवार का पेट वो पालती है ।

भीख मांगती ग्राहकों से

अपनी पहचान छुपाती है ।

रोज़ गालियों के पत्थर

छाती पर अपनी खाती है ।

 

कुछ मंच पर गाना गाती

कुछ सुरधार बहाती हैं ।

भोजन और विषपान कराती

भाव भंगिमा दिखाती हैं ।

कुछ पैसों की ख़ातिर करती

कुछ मज़बूरी में करती हैं ।

दोनों सूरतों में यह नारी

सबके ख़ंजर सहती है ।

 

छोड़ के सारे रिश्ते नाते

संग सहेली रहती है ।

रोज़ रात को बार की शोभा

बार गर्ल से सजती है ।

नहीं मन से करती सब कुछ

मजबूरी करवाती है ।

नारी की समर्पण शक्ति

यही मिसाल  दर्शाती है ।

 

Comments

comments

Rating: 4.3/5. From 3 votes. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 7
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    7
    Shares
MA. Political Science MA. Hindi B.ed Hindi/ Social Science MPhill. Hindi Sahitya

One Comment

  1. ओनिका सेतिया 'अनु' February 12, 2018 at 12:24 pm

    बेहद मार्मिक कविता

    Rating: 3.0/5. From 1 vote. Show votes.
    Please wait...

Leave A Comment