अब मैं आता हूँ मात्र

अब मैं आता हूँ मात्र

अब मैं आता हूँ मात्र !
(मधुगीति १८०२११)

अब मैं आता हूँ मात्र,
अपनी विश्व वाटिका को झाँकने;
अतीत में आयोजित रोपित कल्पित,
भाव की डालियों की भंगिमा देखने !

उनके स्वरूपों की छटा निहारने,
कलियों के आत्मीय अट्टहास की झलक पाने;
प्राप्ति के आयामों से परे तरने,
स्वप्निल वादियों की वहारों में विहरने !

अपना कोई उद्देश्य ध्येय अब कहाँ बचा,
आत्म संतति की उमंगें तरंगें देखना;
उनके वर्तमान की वेलों की लहर ताकना,
कुछ न कहना चाहना पाना द्रष्टा बन रहना !

मेरे मन का जग जगमग हुए मग बन जाता है,
जीवित रह जिजीविषा जाग्रत रखता है;
पल पल बिखरता निखरता सँभलता चलता है,
श्वाँस की भाँति काया में मेहमान बन रहता है !

मेरी सृष्टि मेरी द्रष्टि का अहसास लगती है,
और मैं अपने सुमधुर सृष्टा का आश्वास;
दोनों ‘मधु’ सम्बंधों में जकड़े,
आत्म-अंक में मिले सिहरे समर्पण में सने !

रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’
www.GopalBaghelMadhu.com

टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा

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मथुरा, उ. प्र., भारत में जन्म । एन. आई. टी., दुर्गापुर (प.बंगाल) से १९७० में यान्त्रिक अभियान्त्रिकी, ए. आई. एम. ए. नई दिल्ली से १९७८ में प्रबन्ध शास्त्र, आदि । ४८ वर्ष काग़ज़ उद्योग में महा प्रबंधन, व्यापार व आयात निर्यात ।

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