नफरत है आग, मोहब्बत है रोशनी

नफरत है आग, मोहब्बत है रोशनी

कोई राम पर लड़ रहा है
कोई इस्लाम पर लड़ रहा है
किसी को कीर्तन पसन्द नहीं
कोई अज़ान पर लड़ रहा है
बड़े-बड़े लोगों के पास
ये ही छोटे-छोटे मुद्दे हैं
कैसे फूट पड़े जनता में
वो ऐसी कहानी बुनते हैं
भोली भाली जनता है
बहकावे में आ जाती है
इन मुद्दों की राजनीति को
जनता समझ नहीं पाती है
जो मुद्दा जहन में भी होता नहीं
उसे जान बूझकर उछाला जाता है
आम जनता की जो कमजोरी है
निशाना उस पर ही साधा जाता है
अपने धर्म, समझ पर लगती चोट
जनता देख नहीं पाती है
राजनीति के इन खेलों में
जनता कठपुतली बन जाती है
इन मुद्दों पर लड़ते रहने से
होता जनता को कोई भी लाभ नहीं
वो बड़े लोग हैं कुछ भी कह जाते है
उन्हें आम जनता से कोई लगाव नहीं
आम जनता को लड़वाकर
वो सब साथ में बैठे रहते हैं
हमारे घरों में आग लगाकर
वो उससे होली खेलते रहते हैं
उनकी बातों में ना आओ
साथ में हमे ही रहना है
एक दूजे से हाथ मिलाकर
आगे बढ़ते रहना है
ये धर्म, समाज सब यही रहेंगे
ये कीर्तन, अजान भी होते रहेंगे
सबसे पहले मानवता है
बस वो खत्म ना हो जाए
हर घर में आग लगी हो
इतनी नफरत ना बढ़ जाए
प्रेम के दीप जलाओ दोस्तों
कहीं इस देश और दुनिया से
मोहब्बत के दीप ना बुझ जाए

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प्राध्यापक(हिंदी साहित्य)

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