मेरा फैसला था

मेरा फैसला था

By | 2018-02-15T23:12:18+00:00 February 15th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

मेरा फैसला था
मेरी थी मर्ज़ी
बहकाया नही था किसी ने
किसी ने बहलाया था लेकिन
झूठ तो नही,पर सच को छुपाया था किसी ने
छुपाया तो उसने भी नही था ये तो शायद मैंने ही नही खोली थी आंखे अपनी
कही न कही सच को देखा था जब हल्की सी आँखे खुली थी
धुंधला था मगर बहुत डरावना था उस पल आँखें कस कर भींच ली थी।
और उसका सामना करने के समय को पीछे धकेलने के लिये अपनी पूरी ताकत लगा दी थी
लेकिन ज़्यादा नही पीछे धकेला गया वो पल और
दुगनी ताकत से रोंद्ता हुआ मेरी छाती पे आ बैठा उसकी भयानक हंसी और डरावना चेहरा और मेरी खुली आंखे
यही है जो अब आजऔर आने वाले कल को यूँ ही रोंद्ता जाएगा
पर मर्ज़ी मेरी थी और फैसला भी
खुद की बर्बादी का
खुद की तबाही का

Comments

comments

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 3
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    3
    Shares

About the Author:

Leave A Comment