गुबार

गुबार

By | 2018-02-18T23:58:16+00:00 February 18th, 2018|Categories: गीत-ग़ज़ल|Tags: , , |0 Comments

रदीफ निभाइये ‘रक्खा है, :-

अपने ऊपर सभी दुनियाँ का भार रक्खा है।
कहने को ताज वो सर से उतार रक्खा है।।

शानो-शौकत में दिखाई नहीं देती है कमी।
घर में सामान मगर सब उधार रक्खा है।।

उसने गुलशन में बहुत फूल भी खिलायें हैं।
उनके दरम्यान मगर खौफे- खार रक्खा है।।

यूँ तो मुझको भी मुकाबिल में बुलाया है मगर।
उसने पहले से मेरे हक में हार रक्खा है।।

बड़ा मुश्किल है जमाने में ये समझ पाना।
किसके दिल में कहां कितना गुबार रक्खा है।।

मुझे जालिम के जुल्म की फिकर नहीं होती।
मदद में मैंने खुदा को पुकार रक्खा है।।
**जयराम राय **

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