निम्मी

निम्मी

वह पंजों को हाथ की तरह फैलाकर बीच में अपना काला चितकबरा थूघुन रुखकर नींद की मुद्रा में लेटी थी, लेकिन वह सो नही रही थी, सोने की मुद्रा में आराम फरमा रही थी, मेरे कदमो की आहट मिलते ही वह खड़ी होकर भूंकना शुरू कर दी थी……ठीक सीमा पर मुस्तैद सिपाही की तरह उसने मुझे चेतावनी दे डाली……….” खबरदार आगे मत बढ़ना।”
सर के ऊपर उगे झबरे और स्वेत बाल किसी साधु की जटाओं के मानिंद थे…पांव में काली सफेद पड़ी बिंदी और लम्बी झबरीली पूँछ उसके व्यतित्व को शानदार बना रहीँ थी।मेरी आगे बढ़ने की हिम्मत नही हुई, मै कुछ भय से, कुछ उसकी सुंदरता को निहारने की ललक से जड़वत कुछ पल के लिए वहीँ खड़ा रहा….शायद डा. शर्मा को किसी के आने की भनक उसके भूँकने के अंदाज़ से लग गई थी।

वे बाहर निकलते हुये बोले…”नहीँ नही !! निम्मो !! ये मेरे कवि मित्र है, इन्हें मैंने ही बुलाया है।”
वह कुतिया मस्तानी चाल में कूँ कूँ करती हुई मेरे पांव को सूंघने लगी…शायद आगंतुक के सत्कार करने का उसका यही तरीका हो।
“भीतर आ जाओ”….शर्मा जी मुझसे बोले।
हम दोनों सामने बने ड्राइंग रूम में आकर बैठ गये….. निमी भी चुपचाप आकर उसी कमरे के कोने में रखी तिपाई पर शांत मुद्रा में किसी सयाने की तरह बैठ गई।

“आने में विलम्ब कर दी, जब की तुम्हारा स्वभाव मेरी जानकारी अनुसार ऐसा नही है”…शर्मा जी गला साफ करते हुए बोले।
आपकी जानकारी सही है सर !! मै समय से ही घर से चला था, लेकिन हनुमान चौराहे के पास कालेजी लड़को ने सड़क रोक रखी थी…..आपने भी आज के अखबार में पढ़ा होगा ऑटो टैक्सी
में की गई किराया वृद्धि को लेकर वे कल से विरोध कर रहे हैं.. जब घण्टे भर बाद प्रशासनिक अमले की समझाइस से जाम खुला, तब आ रहा हूँ।

भई !! “आजकल तो यही सबसे घटिया और सरल तरीका लोगों के पास बचा है….सड़क में बैठ जाओ और आवागवन रोक दो…..रेल की पटरियों में बैठ जाओ रेलगाड़ी रोक दो….इन्हें पता नही उस मार्ग से निकलने वालों में से कोई बीमार है….कोई गर्भवती महिला है जिसे अस्पताल पहुँचना जरूरी है….इन्हें कोई मतलब नही कोई मरे या जिये इनकी बला से”…..डा. शर्मा यह कहते कहते उत्तेजित हो गये थे…..बुजुर्ग चेहरे पर बनती बिगड़ती आकृतियां उनके आक्रोश का साफ संकेत दे रहीँ थी। बीच बीच में निमी भी पूँछ हिलाकर और कूँ कूँ के साथ उनकी बात का समर्थन कर देती थी…..अब उसने स्वर बदल दिया था….कें कें की आवाज उन बड़े और नुकीले दांतों के बीच से निकाल रही थी…जो जीभ के अग्र भाग को संतुलित रखते है…..शायद कह रही हो मालिक !! ‘मुझे आदेश करें…और वहाँ ले चलें……मै दो मिनट में जाम खुलवा दूँगी।”
तभी बिटिया काफी दे गई…अपना अपना कप हम दोनों सम्हालते हुये काफी पीने में मशगूल हो गये, कुछ समय के लिए बैठका में ख़ामोशी छा गई।

“आजकल क्या चल रहा है??” शर्मा जी ने यह पूँछकर ख़ामोशी को विराम दिया।
कुछ नही सर !! थोड़ा बहुत लिख लेता हूँ… एक ग्रामीण विषयवस्तु आधारित उपन्यास को पूरा करने में लगा हुआ हूँ, जब भी वक्त मिलता है, उसी में कुछ लाइनें जोड़ देता हूँ।

“बहुत अच्छा कर रहे हो….वैसे आजकल गाँव की बाते इन नेताओं के सिवा कौन करता है, वो भी चुनाव के टाइम में, जातीय गणित फिट करने में गाँव का रुख करते है,, और आज के साहित्यकारों को तो गाँव से परहेज है….उनका भी दोष नही….गाँव कभी देखे नही..जो गाँव  के आकर शहर में घर बना लिए है..दो चार तुकबंदी रच लिए है…उन्हें तो अपने गाँव का नाम बताने में शर्म आती है। अब देखो न अखबारों में कैसी कविताएं छप रही है..न पैर का पता न पूँछ का पता और कहानी… क्या कहें कहानी के नाम पर चुटकुल्ले…..बर्बाद कर दिया साहित्य को इन चाटुकारों ने चुटकुलेबाजों ने….जी तो होता है…सबका गला मरोड़ दूँ।”

सर !!” वर्तमान में जो प्रगतिशीलता का दौर चला है, उससे साहित्य भी अछूता नही है, इनका मापदण्ड मेरी समझ में नही आ रहा है, क्या मानवीय सम्वेदनाओं को दरकिनार करके ही प्रगति का मार्ग पुष्ट
होता है ? क्या इनके लिए कोई और रास्ता नही है ?? क्या कपड़े उतार कर देह प्रदर्शन करने वाला ही प्रगति शील माना जायेगा,?? ये प्रगतिवादी लोग साहित्य और समाज का कितना भला करने जा रहे है?”

“ये बीमार सोच के लोग है…इनसे साहित्य का कोई भला नही होने वाला है…सस्ती लोक प्रियता हासिल करने के लिए ये तथाकथित प्रगतिशील लोग खास तौर से युवा वर्ग को बरगला रहे,
आज टेलीविजन और पुस्तकों में छःपा साहित्य में मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता और फूहड़पन परोसा जा रहा है।”
निम्मी हम दोनों से बातें बड़े गौर से बैठी सुन रही थी…बीच बीच में कूँ कूँ हूँ हूँ की आवाज से कही बात का समर्थन करती प्रतीत हो रही थी।

“मंचीय कविता भी इस समय चुटकुलों पर उतर आयी है”…मैंने कहा।

“उतर आयी नही, उतार दी गई, और जानते हो…इसका पूरा श्रेय इन जोकरों को जाता है जो कवि और शाइर का पुछल्ला लगाये..मंचों में बन्दर की तरह उछल कूद मचाते हुये चीखते चिल्लाते है।”
“श्रोता भी तो आज के यही पसन्द करते है”….मैंने कहा।
“श्रोता !! अरे कौन सा श्रोता….ये हुल्लड़बाज…मदक्की कवि के मदक्की श्रोता….हा हा हा हा
भई जानते हो कविता और शेरो शायरी के रसिया तो बेचारे घर भीतर रजाई में दुबके है, अच्छा साहित्य लाओ….तभी ये बाहर निकलेंगे।”

शर्मा जी थोड़ा ठहरे और पास में रखा पानी का गिलास उठाकर पीने लगे…इधर निम्मी फिर से ..कें कें हूँ हूँ…करने लगी थी। ये जानते हो क्या कह रही है ?

नही सर !!
ये कह रही है..मेरे पास अगर वाणी का प्रासाद होता तो आजकल के कवियों से अच्छा तो मै कविता सुना सकती हूँ।
आपकी निम्मी है न !!
“जानते हो…मेरी हर नई रचना की पहली श्रोता यही होती है।”
वाह वाह !! मेरे मुँह से अपनी तारीफ सुनकर निम्मी पूँछ हिलाने लगी थी…..जैसे मेरा धन्यवाद कर रही हो।
“जानते हो”…..(यह उनका तकिया कलाम है किसी भी नई बात की शुरुआत प्रायः ” जानते हो” से ही करते हैं) इसी दिसम्बर माह में निम्मी ने तीन बच्चे जने थे, दो मेल थे और एक फीमेल  थी …गोल मटोल…. बड़ी बड़ी चमकदार आँखों वाले…सचमुच बहुत प्यारे थे, अभी पिछले पखवारे एक ठाकुर को दे दिया हूँ…. अम्मा बोली थी की ये अब चार हो गये है…इन सबकी समुचित देख रेख नही हो पायेगी…. मुझे भी लगा अम्मा ठीक कह रही है….लेकिन ह्रदय कभी सहमत नही हुआ….वह सदैव यही कहता रहा कि… तुम कवि हो, शहर में तुम्हारा बड़ा नाम है इन मासूमो ने क्या बिगाड़ा है कि इन्हें इनकी माँ से जुदा करने की सोच रहे हो। जानते हो … अंत में अम्मा की बात को व्यवहारिक और उचित मानकर उन बच्चों को ठाकुर को दे दिये गये।

ओह !! “दुखद”…मेरे मुँह से अचानक निकल गया।
जानते हो…….अनुज !! तुम सह्रदय इंसान हो, मेरी पीड़ा का सहज ही अनुमान लगा सकते हो, चार दिन तक मेरे घर में भोजन नही बना…निम्मी और मेरे आँख से आँसू थमने का नाम नहीँ ले रहे थे…..मैंने अपने आप को समझाया सम्हाला….सोचा जानवर है धीरे धीरे निम्मी बच्चों को भूल जायेगी…. बच्चे भी इसे भूल जायेगें…. लेकिन नही मेरी समझ गलत निकली, आज भी हम लोग निम्मी के सामने उसके पिल्लों का जिक्र नही करते ….रोने लगती है। वो आँगन में है…तभी यह सब बता पा रहे है।”

वातावरण बहुत बोझिल हो गया था….शर्मा जी के आँख से आंसू बह निकले थे, जिसे बारबार छिपाने की वे कोशिश कर रहे थे….मैंने सोचा माँ आखिर माँ होती है….उसकी अलग से कोई जाति मजहब नही होता है।तभी तो उसे जन्म भूमि और स्वर्ग से भी बड़ा कहा गया है। मैंने शर्मा जी से जाने की अनुमति चाही, वे सोफे से उठते हुये बोले…..

“ठीक है भाई, आते जाते रहा करो…मुझे बहुत अच्छा लगता है…..”
निम्मी को जाने कैसे पता चल गया कि मैं जा रहा हूँ…. वह आँगन से दौड़कर आयी …दोनों पंजे उठाकर मेरे घुटनो से टिकाकर दुम हिलाने लगी….मुझे उसकी मुहब्बत समझ आ गई थी
अब डर की जगह मेरे दिल में भी उसके प्रति प्यार आ गया था…मै दोनों हथेलियों से उसके सर के बालों में हाथ फेरने लगा।

/समाप्त/

Comments

comments

Rating: 3.7/5. From 3 votes. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 2
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    2
    Shares
रामानुज श्रीवास्तव अनुज सेवानिवृत सहायक प्रबन्धक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रीवा स्वतंत्र लेखन विधाएं..गीत ग़जल, नज़्म, दोहे, लघुकथा, कहानी, व्यंग, उपन्यास, कहानी संग्रह और व्यंग संग्रह की एक एक किताब प्रकाशन में हैं, एक उपन्यास प्रकाशन में है।

Leave A Comment