धरा पर नव वसंत आया

धरा पर नव वसंत आया

By | 2018-04-09T00:07:07+00:00 February 25th, 2018|Categories: कविता, होली|Tags: , , |0 Comments

फाल्गुन ने रंग जमाया, धरा पर नव वसंत आया|

शिशिर के सिहरन का हुवा अंत,

सिंहासन पर आ बैठा बसन्त;

लता ने पाया तरु सा कन्त;

फैला कर दिगंत पर्यंत,

किसने यह बहुरंगा दुकूल बिछाया, धरा पर नव वसंत आया ||१||

 

सह-सहकर शीत के तीक्ष्ण बाण,

लताएँ थीं कल तक म्लान,

उठ रहीं आज वे सीना तान,

सुन -सुन गुण फागुन के बखान ,

वेणुरंध्र से मोहन ने आज अनुपम सुर सजाया | धरा पर नव  वसंत आया ||२||

 

झूम उठे खेतों में बाली,

बाली के गालों में झलकी लाली,

तान सुनाये कोयलिया काली,

गीतों से छलकी मधुरस प्याली|

अभिनन्दन कर ऋतुपति का, दिक्-दिगंत हरसाया| धरा पर नव वसंत आया ||३||

 

धरा ने दिया, शांत रस त्याग,

बढ़ा श्रृंगार से उसका अनुराग,

फूलों  से उड़ रहे मादक पराग,

गाये गंध वह मधुर विहाग ,

धरकर अंग, सुमन-सायक संग, अनंग आया| धरा पर नव वसंत आया||४||

 

अलमस्त भ्रमर, मदमस्त गुंजन,

झर रहे धरा पर मानव मधुकण,

उसपर पूरबैया का पागलपन,

पाषाण में भी जगा, आज स्पन्दन,

अरहर की सुखी फलियों ने रुन-झुन नुपूर बजाया| धरा पर नव वसंत आया||५||

 

है निरभ्र गगन पिताभ धरा,

है कण कण कंचन सा निखरा,

है क्षण-क्षण  नव आमोद भरा,

है दिशि -दिशि  कुजन से मुखरा,

संध्या के सुरमई अंचल चिर, पूर्ण चन्द्र मुस्कराया| धरा पर नव वसंत आया ||६||

 

गोपियाँ सरल कान्हा चितचोर,

बजे मृदंग, गलियों में शोर,

मधुमंगल, सुबल संग नवल किशोर,

करने रंगों में सराबोर,

मटकी भर माखन में ही, रंग-सात घोर कर लाया| धरा पर नव वसंत आया||७||

                                                         – सुबल चंद्र राय “सुधाकर”

पीताभ – पीले वर्ण का,अनंग – कामदेव, सायक – कामदेव का धनुष

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