ओ३म् ! जगत को स्वामी . . . . . !

ओ३म् ! जगत को स्वामी . . . . . !

। । ॐ । ।

* * * भजन * * *

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी
हरिहर मेरे राम जी
मीठा फल पावे जो कोई ध्यावे
सुबह – दोपहर और शाम जी

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

पेड़ों में सब जीवों में तू
नर में तू तू ही नारी में
सागर में तू पर्वत पर तू
वन में तू तू ही फुलवारी में

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

एक तेरा नाम सांचा
दूजा न कोई और है
चरण- कमल पर झूमता
मेरे मन का भौर है

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

चुप में तू सुख – दु:ख में तू
कानों में तेरा शोर है
तुझसे है रात सुहावनी
तुझसे ही मीठी भोर है

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

तेरी महिमा तू ही जाने
मुझसे कहा कुछ जावे न
जिह्वा देखे आंखें बोलें
कोई समझ कुछ पावे न

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

संत कहें हनुमंत कहें
सुन लो होकर पास रे
कलह – क्लेश न टिकते उस घर
जिस मन में तेरा वास रे

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

तेरी सुनूं बस तुझे निहारूं
होऊं तेरे चरणों की धूल मैं
शीश चढ़ूं तेरे पांव पड़ूं
तेरी बगिया का फूल मैं

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

तेरी दया का दाता मेरे
ओर है न छोर है
उड़ूं मैं ऊंचे और ऊंचे
जब तक सांसों की डोर है

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

जय – पराजय तेरी इच्छा
मेरी न कोई साध रहे
पुण्य – प्रताप सब अर्पण तेरे
मेरा न कुछ अपराध रहे

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

न मैं विधि पूजा की जानूं
न मैं जानूं मांगना
कृपाओं से मेरी झोली भर दे
जग देखे भाग्य का जागना

ओ३म् ! जगत के स्वामी प्रभु जी . . . . . !

११-११-२०१६ —–वेदप्रकाश लाम्बा

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