विकास

विकास

 

क्या चटक है ,दुनिया
बड़ी हसीन नज़र आती है।
अजी ! लाल रंग है जनाब
तभी आँखें चुंधिया जाती हैं।
मुर्दा है शराफत ।
ढोंग है वफादारी ।
अपनी बात , केवल स्वार्थ ।
खरीदे मुँह,खोखले जज़बात ।
इसमें ही है मजा!
ऐसी जिंदगी ही विकास कहलाती है ।।
ऐसा विकसित हाथी है
तब सोचता ।
जंगल क्या है?मैं ही हूँ जंगल।
बस मैं ही यहाँ की शान हूं।
परेशानी तो तब होती है ।
जब सच्चाई सामने आती है।
और उस हाथी का काम- तमाम एक चींटी कर जाती है ।

मुक् ता शर्मा

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

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