बघेली बोली एक झलक

बघेली बोली एक झलक

[28/02 5:55 PM] रामानुज श्रीवास्तव अनुज: बघेली एक झलक
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मध्यप्रदेश के रेवा (रीवा, बघेली में रीमा) के आस पास बोली जाने वाली बोली रिमही थी।
रीवा में ठेठ रिमही बोली बोली जाती थी।मध्यप्रदेश के सतना सीधी शहडोल जिलों की रिमही
सीमांत क्षेत्रों की बोली से मिश्रित थी। “कोस कोस में पानी… चार कोस में बानी” की उक्ति
इसमें चरितार्थ थी। रीवा नरेश महाराजा वीरभान सिंह (1540….1555 ई.) के पहले सी ही
यह बोली चलन में थी। उस समय रीवा नरेशों की बान्धव गद्दी (बांधवगढ़) का साम्राज्य
आधे छत्तीसगढ़ (रतनपुर) से बुन्देलखण्ड के केन तक, इलाहबाद में अरैल पार तक था।
रिमही इस क्षेत्र में समृद्ध बोली थी।

बांधवगढ़ गद्दी रीमा स्थानान्तरित होने के बाद अंग्रेजी राज्य की पहली संधि महाराजा
जय सिंह (1809…1833) से हुई। उसके बाद महाराज विश्वनाथ सिंह के समय तो रीवा
राज्य बघेलखण्ड पोलिटिकल एजेंसी हो गया और राज काज में “रीमा” के स्थान पर बघेलखण्ड
का ही प्रयोग होने लगा।उसी समय उत्तर भारत की बोलियों भाषाओं का अध्ययन, सर्वेक्षण
एवं वर्गीकरण हुआ तथा बन्देली की तरह ही बघेल खण्ड पोलिटिकल एजेंसी में बोली जाने वाली
बोली का नाम रखा गया और इसे अवधी की उपबोली में वर्गीकृत किया गया, किन्तु इस बोली
के विकास के साथ साथ अब यह बोली (बघेली) स्वतंत्र बोली है। इसका समृद्ध साहित्य है,
तथा विस्तृत क्षेत्र है। कहने का आशय यह है कि प्राचीन रिमही ही अब बघेली नाम से
व्यवहृत होती है तथा इसका सम्पूर्ण साहित्य बघेली साहित्य के नाम से जाना पहचाना जाता
है। यह भी ज्ञातव्य है कि बघेली साहित्य का श्रीगणेश भी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध
से ही हुआ, हाँ लोक गीत अवश्य बहुत पुराने है, जिनका काल निर्धारण करना सम्भव नही
है।

बघेली के प्रथम कवि हरिदास भी महाराजा विश्वनाथ सिंह (1833—1854) जो हिंदी के
प्रथम नाटक ‘आनंद रघुनन्दन” के रचयिता के समय हुये, उन्होंने बघेली में “चौगोलवा”
कहे, हरिदास की कोई प्रकाशित कृति नही है। किंतु बघेलखण्ड के लोगो में इनका ‘चौगोलवा”
कंठस्थ है। जो रीवा जिले की तहसील गुढ़ की एक पत्रिका में इनके चौगोलवा प्रकाशित हैं।
बघेली साहित्य में बघेली काव्य ही सबसे पुराना एवं समृद्ध है। हरिदास, बैजू, शंभू सैफू
गोमती विकल, अमोल बटरोही, कलिका प्रसाद त्रिपाठी, की काव्य तरंगिणी अब सुरसरि
सी प्रवाहित है। वर्तमान में रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, शहडोल, उमरिया, अनूपपुर
तथा डिंडोरी में कुल मिलाकर दो सौ से अधिक कवि हैं। पचास से अधिक बघेली कवियों की
कृतियाँ प्रकाशित है। कहानीकार भागवत शर्मा चन्द्र, रामसिया शर्मा, उपन्यासकार अभयराज
त्रिपाठी, नाटककार योगेश त्रिपाठी बघेली साहित्य को समृद्ध करने में सतत साधना रत हैं।
बघेली शब्दकोश भी लिखा जा रहा है। बघेलखण्ड व्याकरण भी प्रकाशित है।
[28/02 8:52 PM] रामानुज श्रीवास्तव अनुज: भोजपुरी मैथिल अवधी, बघेली, बन्देली, मालवी, छत्तीसगढ़ी बहुत कुछ आपस में
मिलती जुलती है।एक बोली के शब्द दूसरे में भी पाये जाते हैं। लेकिन सभी बोलियों की स्वतंत्र
सत्ता है, सभी का अपना अपना क्षेत्र है, अपना साहित्य है, उनको दूसरे में लाना उचित नही है।
जैसे रामचरित मानस अवधी में है, यद्यपि उसमे पर्याप्त शब्द बघेली के हैं, किंतु उन्हें बघेली का
नही कहा जा सकता है, हाँ हिंदी का कहा जा सकता है, क्योकि हिंदी की किसी बोली, उपबोली
में लिखा गया काव्य हिंदी का होगा ही।

बघेली में अधिकतर संस्कृत के तद्भव शब्दो का प्रयोग हुआ है। “अहम” संस्कृत में एक वचन है
जबकि बघेली में “हम” कहते है। बघेली का एक कठिन शब्द “थानमनंगा” संस्कृत के
“स्थानमनंगा” का तद्भव है। हिंदी के “स्त्री” शब्द का तद्भव बघेली में “तिरिया” और “मनुष्य”
का मन्नुख है। उर्दू के तद्भव शब्द भी बघेली में समाहित है। बघेली में श को स, ष को ख,
क्ष को छ व को ब बोला जाता है।

जैसे…
देश….देस
भाषा…. भाखा
पर्ण…. पान
अक्षर…अच्छर
विशाल….बिसाल

अंग्रेजी शब्दों का भी बघेली करण हुआ है। जैसे….
इंजिन…इंजन
रिपोर्ट….रपट
गार्ड….गारद
इंस्पेक्टर….निस्पेक्टर
टाइम….टेम
सिग्नल…..सिंगल
मास्टर…माटटर

अब तो बघेली बोली में अंगेजी उर्दू और संस्कृत के शब्दों को बिना तद्भव किये ही सीधे सीधे
बोला समझा जाता है। कुछ ठेठ बघेली शब्द बघेली के ही हैं इनकी व्युत्प्तति करना कठिन है
जैसे……
हला…. सवारी,
अड़गड़….विचित्र
गभुआर… अबोध शिशु
औचक….अकस्मात
औचट…बहुत तेजी से
बोंचर…पागल
फरिका…घर के बाहर खुला क्षेत्र
खरकउनी….जानवरों के एकत्र होने की जगह
लबरा….झूठ बोलने वाला
परियारी…..नाई का उपकरण पेटी
करियारी….घोड़े का लगाम
अउजी….बदले में कुछ लेना

अंत में मै कहना चाहूँगा कि बघेली साहित्य का पर्याप्त विकास हो रहा है “गद्य” में भी अब ललित
निबंध लिखे जा रहे हैं, किन्तु सर्वाधिक विकसित है बघेली कविता , जो साधारण तुकबन्दी से
चलकर प्रतीक बिम्ब से सशक्त होती हुई ध्वनि काव्य तक पहुँच गई है।बघेली में मुक्त छंद
रचनाएँ भी हो रही हैं, गजले कुंडलिया, मुक्तक, गीत, नवगीत में रचनाएँ हो रही हैं। बघेली साहित्य
सशक्त एवं सम्पन्न है, किन्तु बघेली बोलने और समझने वालों की संख्या कम हो रही है।

डा. अमोल बटरोही
एम.ए. अंग्रेजी, संस्कृत (गोल्ड मेडलिस्ट) पी. एच-डी.
कवि..बघेली, हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी
से. नि. जिला शिक्षा अधिकारी म.प्र. शासन

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रामानुज श्रीवास्तव अनुज सेवानिवृत सहायक प्रबन्धक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रीवा स्वतंत्र लेखन विधाएं..गीत ग़जल, नज़्म, दोहे, लघुकथा, कहानी, व्यंग, उपन्यास, कहानी संग्रह और व्यंग संग्रह की एक एक किताब प्रकाशन में हैं, एक उपन्यास प्रकाशन में है।

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