हनीमून

हनीमून

लघुकथा….हनीमून…….होली मुबारक
——————————————-
“तू इतनी उदास क्यों है”……….सियारनी को मुँह फुलाये बैठी देख सियार बोला।
तुमसे मतलब ?? तुम तो गाँव देहात के बाहर ही हू हू करके मस्त हो, कभी सोचा है इस सड़ियल
और अँधेरे में डूबे गाँव के आगे भी कुछ है?”
“जरा समझाकर कहो”…सियार बोला।

“कल मैंने सपने में देखा है कि “इस पहाड़ी से पार एक खूबसूरत शहर है, जिसमे बड़े बड़े आकाश
को छूते मकान है, रंग बिरंगी रौशनी में नहाया हुआ पूरा शहर जन्नत जैसे लगता है।वहां रहने वाले
आदमी खूबसूरत और साफ सुथरे हैं, तरह तरह के परिधानों से सजी औरतें अप्सरा सी हैं।
छोटे छोटे बच्चे खरगोश की तरह धमाचौकड़ी भरते दीदे मटकाते गली में खेलते हुए बहुत सुन्दर
लग रहे हैं।

हू–हू–हू—-हम सियारों के सपने कभी सच हुयें है, पगली !! सियार हँसते हुए बोला।

“देखो बहाने मत बनाओ, हमारे विवाह को एक साल हो गये है , तुमने इस गांव को छोड़कर कहीँ
ले जाने की नही सोची, उस पहाड़ी तक भी घुमाने नही ले गये।आजकल लोग हनीमून के बहाने अपनी
बीवी को कहाँ कहाँ नही घुमाते।…ठीक है उस पहाड़ी तक तो चलो, कोई शहर होगा तो दूर से दिख
जायेगा, वही से देखकर खुश हो लेंगे।”

सियार को सियारनी की बात जम गयी..वह उसे साथ लेकर पहाड़ी की ओर चल पड़ा, पहाड़ी
जाने का रास्ता बस्ती से होकर गुजरता था, जैसे ही ये दोनों बस्ती में पहुँचे, कुत्तो ने खदेड़
लिया, दोनों किसी तरह जान बचाकर अपने ठिकाने लौट आये। सियारनी बहुत मायूस होकर
अपनी तकदीर को कोसती हुई, झाड़ी में जाकर लेट गई सियार से उसकी पीड़ा देखी नही गई
वह उसके सर में पंजा फेरता हुआ बोला…..

प्रिय !! फ़िक्र मत करो…फ़िक्र से सेहत पर बुरा असर पड़ता है….मैं अभी चिक्की लोमड़ी के पास
जाता हूँ, जानती हो बुद्धिमानी के लिए उसे इस साल का सबसे बड़ा इनाम मिला है। उसके पास
कोई न कोई हल जरूर होगा। सियार ने एक लंबी दौड़ लगाई, कुछ ही देर में वह चिक्की के घर बैठा
चाय पी रहा था। सियार ने लोमड़ी को अपनी समस्या बताई। उसने सियार की बात बहुत सिद्दत
से सुनीफिर भीतर से एक पुराने अखबार का टुकड़ा ले आयी और सियार को दिखाती हुई बोली…….

“भाई !! ये देखो कलेक्टर साहब ने बस्ती होकर पहाड़ी जाने वाले मार्ग को आम रास्ता घोषित किया है,
किसी प्रकार की रोक टोक गैर कानूनी है, तुम निश्चिन्त होकर पहाड़ी को जाओ….कुत्ते भूंकेगे तो
उन्हें यह अखबार पढ़ने को देना।

सियार ने लोमड़ी का धन्यवाद किया और अखबार का टुकड़ा मुँह में दबाये, ख़ुशी से भागता
हुआ घर आया और सियारनी से बोला…” उठो प्रिय चलने की तैयारी करो, पहाड़ी जाने से अब कोई
नही रोक सकता, ये देखो लोमड़ी भाभी से कलेक्टर साहब का छपा छपाया हुक्म ले आया हूँ,
इसमें साफ साफ लिखा है, बस्ती होकर पहाड़ी जाने वाला मार्ग सार्वजनिक निस्तार में है।
किसी के आने जाने में कोई रोक टोक नही है।”

सियार और सियारनी फिर पहाड़ी की ओर चल पड़े, बस्ती में पहुँचते ही फिर कुत्तों का समूह
भूंकते हुये दौड़ा। कुत्तों को पास आता देख सियार भी भगने लगा, तब सियारनी चिल्लाकर
बोली…..”भाग क्यों रहे हो….अखबार दिखाओ इनको, अखबार दिखाओ।”
भागता हुआ सियार भी जोर से बोला…..”प्रिये तुम भी भागो….जान बचाओ…इस बस्ती में कोई
पढ़ा लिखा नही है।

/समाप्त/

Comments

comments

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 3
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    3
    Shares
रामानुज श्रीवास्तव अनुज सेवानिवृत सहायक प्रबन्धक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रीवा स्वतंत्र लेखन विधाएं..गीत ग़जल, नज़्म, दोहे, लघुकथा, कहानी, व्यंग, उपन्यास, कहानी संग्रह और व्यंग संग्रह की एक एक किताब प्रकाशन में हैं, एक उपन्यास प्रकाशन में है।

Leave A Comment