वर्तमान समाज और मां

वर्तमान समाज और मां

सहसा एक रात सपनों में मैंने,
अतीत के पन्नों में झांककर देखा।
सपनों में मैंने जो देखा,
वो था बड़ा अनोखा।।
मां भी थोड़ा सो रही थी,
सपनों में वो भी खो रही थी।
वर्तमान समाज को सोच रही थी,
आज के परवरिश को कोष रही थी।।
कर्त्तव्यों के बोझ को ढ़ो रही थी,
मन ही मन ये सोच रही थी।
इकलौते मां बाप ने कष्ट सहकर,
चार चार बच्चों को है पाला।
पर उन चारों ने मिलकर,
मां बाप का है दण्ड कर डाला।।
समाज के तुच्छ मानसिकता ने उनको,
है सख्ते में ढाला ।
चारों ने मिलकर आज,
मां बाप को है घर से निकाला।।२
मां बाप की बद्दुआओं को हम,
कभी टाल नहीं सकते।
पर क्या? चार-चार बच्चे भी मिलकर,
बूढ़े मां-बाप को पाल नहीं सकते।।
जिस मां ने हमें चलना सिखाया,
जिस मां ने हमें मार्ग दिखाया।
जिस मां ने हमें संसार दिखाया,
जिस मां ने हमें सभ्यता, संस्कृति,
संस्कारों का है सैर कराया ।।
उस मां का आज ये हाल हुआ,
जीवन जीना बेहाल हुआ।
उस मां-बाप का आज कर्म है फूटा,
तभी अकस्मात् मेरा नींद भी टूटा।।
मैं भी मन में सोच रहा था,
ऐसे बच्चों के परवरिश को कोष रहा था।
कितना भी बड़ा हो जाऊं, संसार में खो जाऊं,
जैसे हों घनेरे जंगल।
सीधा-सीधा भोला-भाला मां मैं हमेशा,
रहूंगा तेरा बच्चा ‘मंगल’ ।।

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परिचय- मंगल प्रताप चौहान जी की जन्मतिथि २० मार्च १९९८ ग्राम अक्छोर, राबर्ट्सगंज (जिला-सोनभद्र) है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक करने के पश्चात बहुत ही कम समय में आपके नाम कई कविताओं व अच्छे लेखों का समावेश है।

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