झुनझुने

झुनझुने

। । ओ३म् । ।

* * * देश की बागडोर अभी जिन हाथों में है, उन्हें अपने मन की कहने और करने के लिए कम – से – कम पन्द्रह वर्ष मिलने चाहिएं ।

लेकिन, जहाँ – जहाँ पग टेढ़े पड़ें, वहाँ – वहाँ रोकने और टोकने का दायित्व लेखकों, कवियों, पत्रकारों, अध्यापकों और बुद्धिजीवियों का है ।

इसी दायित्व की पूर्ति का एक प्रयास है यह कविता । * * *

* * * * * झुनझुने * * * * *
——————
किसके लबों पे है हँसी
कौन गुनगुना रहा है
सरकार जानती है सब
कोई जी ऐस टी चुरा रहा है

किसके लबों पे है हँसी . . . . .

किस्मत बुलंद है राम की
तिरपाल सिर पे है तनी
बुलंद इमारतों में तेरा नामलेवा
इक आ रहा है इक जा रहा है

किसके लबों पे है हँसी . . . . .

हाथों में थाम रखिए
सुर्ख़ दामन उम्मीद का
जहाँ – जहाँ से मिट रही है ज़िन्दगी
मुल्क सब्ज़ा हुआ जा रहा है

किसके लबों पे है ज़िन्दगी . . . . .

सदियों रहा है मुल्क मेरा
जाहिलों का डेरा
आया है मर्द मुक्कमल जवॉं
घर – घर शौचालय बना रहा है

किसके लबों पे है हँसी . . . . .

आटा तेल नून और लकड़ियाँ
सब हवा हुए
हिन्दसों की बाज़ीगरी में
हर कोई डाटा खा रहा है

किसके लबों पे है हँसी . . . . .

चोरों का मुल्क बुत रूहों के बिना
इधर – उधर हैं डोलते
सुजान शाह हर जगह
सी सी टी वी लगा रहा है

किसके लबों पे है हँसी . . . . .

नोटों की भूलभुलैया में
तिनके सब बिखर गए
रखवाला अभी बिदेस में
बँसी बजा रहा है

किसके लबों पे है हँसी . . . . .

यारों के सँग उड़ेगा
मानिंद गोली बंदूक की
रेंगता और रेंकता कोई
गधापन दिखा रहा है

किसके लबों पे है हँसी . . . . .

सिर पे आँचल आँखों में हया
राह तकती है उर्मिला की बेटी
लछमन तेरा अभी ख़ातूनों को
जायज़ हक़ दिला रहा है

किसके लबों पे है हँसी . . . . .

चलिए फिर तलाशिए
कोई केशव बलिराम का
बिके हुओं से न उम्मीद रख
मालिक झुनझुना बजा रहा है

किसके लबों पे है हँसी . . . . . ।

१६-९-२०१७ -वेदप्रकाश लाम्बा
०९४६६०-१७३१२

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