चौपाल

चौपाल

By | 2018-03-05T22:10:51+00:00 March 5th, 2018|Categories: लघुकथा|Tags: , , |0 Comments

नगर से चार किलोमीटर दूर हाइवे पर एक कॉलोनी बसी हुई है। लगभग चार हजार की आबादी वाली कॉलोनी के निवासी नगर में व्यापार करते है। बच्चे नगर के स्कूल में पढ़ते हैं। कॉलोनी के बीच चौराहे पर एक मंदिर है जिस के आगे हर सुबह सब्जी मार्किट लगती है। चौराहे पर हर सुबह पीपल के पेड़ के इर्दगिर्द चौपाल जमा कर कॉलिनी के लोग गपशप में समय व्यतीत करते हैं।

“और सुना मंटू आजकल बड़े नोट छाप रहा है?” चिंटू ने दातुन मुंह में चबाते हुए पूछा।

“तेरे को क्या? मेरी दुकान पर नजर क्यों गड़ाए बैठा है?” मंटू बिगड़ गया।

“नाराज क्यों हो रहा है? एक बात बता दूं, बिल्लू से बच कर रहियो। पेमेंट देर से देता है। मेरी मोटी रकम उसके पास फसी हुई है। मुझे रकम दे नही रहा है। मैंने तो माल देना बंद कर दिया है तभी तेरी दुकान पर डेरा जमाए बैठा है।” चिंटू की मुस्कान कुटिल थी।

मन में बड़बड़ाता मंटू चला गया। पट्ठे का सबसे बड़ा खरीददार हड़प लिया तभी तिलमिला रहा है।

मंदिर में दर्शन के बाद लौटते समय सब्जी खरीदते हुए बीना ने रीना को कहा। “तुझे मंटू की लड़की का चक्कर पता है?”

“किसको नही पता। मंटू की लड़की का चिंटू के लड़के के साथ जबरदस्त चक्कर चल रहा है। सबको मालूम है।”

“नही मालूम तो उन दोनों को नही पता। एक दूसरे से व्यापार में लड़ते है। जब बच्चों की करतूत पता चलेगी तब उनके चेहरे का रंग देखेंगे।”

दोनों खिलखिला कर हंस दी। तोलमोल कर सब्जी खरीद घर की ओर रवानगी की।

नौ बजे तक सब्जी मंडी सिमट गई और चौपाल खाली हो गई।

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कहानियाँ लिखना शौक है। फुर्सत के पलों में शब्दों को जोडता और मिलाता हूं।

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