नशा

नशा

By | 2018-03-06T22:07:35+00:00 March 6th, 2018|Categories: लघुकथा|Tags: , , |0 Comments

अस्पताल में अपनी पत्नी के साथ बैठे नीरज गुप्ता जी अपने दिल को कुछ ज़्यादा ही भारी महसूस कर रहे थे। हालाँकि उन्हें कोई दिल की बिमारी नहीं थी मगर हाथ बार-बार सीने पर जा रहा था।

दरअसल वो जहाँ बैठे थे वहाँ उनका 22 वर्षीय पुत्र राघव भर्ती था।

बचपन से ही मेधावी राघव खेल कूद और पढ़ाई हर चीज में अव्वल था। स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद राघव दिल्ली होस्टल में रह कर सिविल सेवा परीक्षा की कोचिंग कर रहा था।

इस उम्मीद के साथ भेजा था माता पिता ने कि “आगे जाकर बेटा नाम करेगा और सहारा बनेगा।”

कोचिंग में कुछ लड़को से नयी दोस्ती, नयी अजादी और मजे के लिए किये हुये नशे मे राघव अपने लक्ष्य से भटक धीरे धीरे नशे की गिरफ्त में आ गया।वो भी हर तरह का नशा करने लगा।

मिलने आये माता-पिता ने जब उसका उतरा हुआ चेहरा देखा तो सोचा कि बाहर रहने का असर होगा और हिदायत दी की “खाने पीने का अच्छे से ध्यान रखे”आगे से ज़्यादा पैसे भेज देंगे।

कुछ दिन बाद राघव दोस्तों के साथ “रेव पार्टी” करते हुये पकड़ा गया।
जमानत मिली और बदनामी भी। साथ ही राघव को कोचिंग से भी निकाल दिया।

बदनामी का डर, घर वालों का सामना और नशा पूरा न कर पाने में असमर्थ राघव अवसाद मे चला गया और अपने हाथ की नस काट बैठा।

ये बात माता पिता को पता लगते ही सीधे दिल्ली पहुँचे जहाँ होस्टल प्रबन्धन ने उसे अस्पताल में भर्ती कर दिया था। हालत बहुत गम्भीर थी।
उसे देखने के बाद भारी हृदय के साथ बैठे हुए माँ बाप अपने बेटे की स्वस्थता की कामना लिए सोच रहे थे –

” कितने जवानों को खायेगा ये नशा, कितनों का भविष्य बर्बाद करेगा।

कुुुुलदीप कुुमार

Comments

comments

Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 4
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    4
    Shares

About the Author:

Leave A Comment