सुमिरन

सुमिरन

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* * * * * *सुमिरन* * * * * *
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हे राम तुम्हारे आने से
है किसके मन में ज्वार नहीं
दीपों की अवलियाँ सज रहीं
मन टिकता बारम्बार वहीं
अमावस पूनम हो गई
शेष नहीं अंधकार कहीं

स्वप्न सुहाने अब तक घेरे हैं
हे राम ! कृपालु कृपा करो
तेरे हैं हम तेरे हैं

स्वप्न सुहाने अब तक घेरे हैं . . . . .

उड़ें विमानों में उड़ने वाले
धरा तल पर जिनका व्यापार नहीं
कच्ची पगडंडियां उनके माथे
किसी रथ के हैं जो सवार नहीं
चाहते मोल जो मेहनत का
माँगते हैं उपकार नहीं

खेत – खलिहान तक अपने फेरे हैं
हे राम ! रथी – रथवान पुष्पक के
तेरे हैं हम तेरे हैं

खेत – खलिहान तक अपने फेरे हैं . . . . .

युग बदले सदियाँ बीतीं
भरत की अब सरकार नहीं
भाटा भाग्य बदा जिनके
झोली में जिनके प्यार नहीं
उन्हें भी दे दाना – दुनका
जिनका है आधार नहीं

अब स्वामी हुए लुटेरे हैं
हे राम ! दयालु दया करो
तेरे हैं हम तेरे हैं

अब स्वामी हुए लुटेरे हैं . . . . .

घर – घर में दीप जलते रहें
रौनक न हो उधार कहीं
सीमा पर होली खेल रहे
दूजी प्रीत इन्हें स्वीकार नहीं
मोल चुका दे शीशों का
धन ऐसा न कोई खरीदार नहीं

पूत ऐसे माँ के बहुतेरे हैं
हे राम ! घट – घट के वासी
तेरे हैं हम तेरे हैं

पूत ऐसे माँ के बहुतेरे हैं . . . . .

स्वप्न सरीखी सोने की लंका
अंजुरी सरयू की जलधार नहीं
पुत्र हुए न राजा के
सती के जो भरतार नहीं
जिनके नयना नीर बचा न
धन की सुनते जो झनकार नहीं

सुमिरन साँझ – सवेरे हैं
हे राम ! मर्यादा की सीमा
तेरे हैं हम तेरे हैं

सुमिरन साँझ – सवेरे हैं . . . . .

जो तू कहे व्रत को तोड़ूँ
तोड़ूँ मैं अपनी ही कही
गणाधिपति गण की सुने नहीं
बन लखन हिला दूँ यह मही
बवंडरों के मौसम न सूझे
कौन पराया कौन सही

राहों में बहुत अंधेरे हैं
हे राम ! जीवन की ज्योति
तेरे हैं हम तेरे हैं

राहों में बहुत अंधेरे हैं . . . . .

तेरा तुझको सौंपते
कहीं मन में कोई विकार नहीं
बल तेरा मुझ निर्बल में मिले
न लूला मैं लाचार नहीं
वानर – भालू सब साथ – साथ
सागर अब दीवार नहीं

प्रभु वन्दन ! चरणों के चेरे हैं
हे राम ! विजेता सदा – सदा के
तेरे हैं हम तेरे हैं

प्रभु वन्दन ! चरणों के चेरे हैं . . . . . !

-वेदप्रकाश लाम्बा
९४६६०-१७३१२

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