😊😊 नारी हूँ मैं 😊😊

😊😊 नारी हूँ मैं 😊😊

By | 2018-03-08T20:19:50+00:00 March 8th, 2018|Categories: कविता|2 Comments

शिव की शक्ति

उनकी ही भक्ति

प्रकृति का प्रारूप हूँ मैं,

नारी हूँ मैं !

अन्तस में समेटे हुए

भावनाओं का अथाह समुद्र

स्व-सम्बन्धों को

प्रेम-निर्झरिणी से स्निग्ध

करती हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

व्रतोत्सव व समारोहों की

प्राण हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

प्रत्येक सामाजिक सम्बन्धों का

आधार हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

आधुनिकता की ओर बढ़ती

साथ ही अपनी

सभ्यता व संस्कृति को

सहेजती हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

वासना के हृदयाघात से

टूट कर बिखरती परन्तु

वात्सल्य-भाव से स्वयं को

दृढ़ता से खड़ी

करती हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

स्वरक्त से सृजित

राष्ट्र के कर्णधारों में

संस्कारों का आरोपण कर

सँवारती हूंँ मैं, नारी हूँ मैं !!!

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परास्नातक,संस्कृत, इ०वि०वि०।(लब्ध -स्वर्णपदक) डी०फिल०, संस्कृत विभाग, इ०वि०वि०।

2 Comments

  1. Sanjay Saroj "Raj" March 9, 2018 at 11:18 am

    गज़ब !!!! अद्भुद !!!

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  2. Upasana Pandey March 28, 2018 at 4:13 pm

    संजय जी, हौसलाफज़ाई के लिए बहुत- बहुत शुक्रिया

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