बता कोकिले :-  [   भाग – २]

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बता कोकिले :-  [   भाग – २]

बता कोकिले !

महारास में पूर्ण चंद्र तले,

की होगी तूने रस का उद्दीपन।

मोहन – वेणु ने की होगी,

कंठ में तेरे अनुपम सुर सिंचन ||

कान्हा ने दिया होगा तुझको ,

निज श्यामलता का वरदान |

सहचर्य से हुआ होगा संचरित,

तुझमें भी गीता का ग्यान ||

अरी कोकिले! नहीं कभी तुम, ढोती हो कंचन का भार ? 

तभी तो गा पाती हो तुम, गा – गाकर देती  उम्र गुजार ||  

कंचन और माटी में कोकिले,

रखती नहीं तू तनिक अंतर|

गूँजते तभी हैं गगन में,

गीतों के तेरे मधुर स्वर ||

कंचन अस्पृश्यता के कारण ,

गीतों से तेरे सुमन झरते हैं |

कंचन के पाले पकड़कर ,

हम हँसने को आज तरसते हैं ||

संचित कंचन का बोझ लिये,  हम घूम रहे हैं सीना तान |  

सहजता रूठ रही है हमसे,मानवता हो रही है म्लान||

भूत का बोझ औ’ भविष्य की चिंता.

इन दोनों पाटों के बीच हाय।

पिसा जा रहा मानव,

होकर निरुपाय असहाय ॥

गीत अगीत हो रहे हमारे,

सध न रहा एक भी सुर।

महक विहीन चंदन वन है,

है मलय पवन भी दूर – दूर ॥

 कंठ रुद्ध हो रहे हमारे, फूट रहे न गीतों के बोल।  

है बंधी स्वर्ण जंजीर में जिह्वा, दे कोई आकर खोल।।

-सुबल चन्द्र राय ‘सुधाकर’

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