घर

घर

By | 2018-03-12T22:30:21+00:00 March 12th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

एक बार कदम जो बाहर रखे
घर के गुपचुप गलियारे से
और गोबर से लीपी हुई देहरी से
न जाने फिर
क्यों वो घर नहीं आया

ढूंढने ही तो चला था
सुखन मैं
बेंचकर अपना
अनगढ़ सा बचपन
फिर क्यों वो सुखन
आकर भी नहीं आया
क्या अब सभी रास्ते
बदल गये हैं
क्या हम
इतना आगे निकल गए हैं
कि अब दौड़कर भी
घर को पहुंचा नहीं जा सकता
या गिर गया है
कोई पहाड़
मेरे और उसके बीच में
जो हमको मिलने से रोकता है

यूं ही मैं
अक्सर कभी कभी
अपनी बेबस और बेसहारा
तन्हाई में
अपने मन से पूंछता हूँ
ये चंद कुछ सवाल
क्यों,क्यों,क्यों…

– प्रदीप

 

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