आज केसरी होली है

आज केसरी होली है

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* मैंने बार-बार कहा है कि देश की सत्ता के सूत्र अब जिन हाथों में हैं, उन्हें अपने मन की कहने और करने के लिए कम-से-कम पन्द्रह वर्ष मिलने चाहिएं ।

लेकिन, उनके आड़े-टेढ़े कदमों को टोकने और रोकने का दायित्व मेरा है ।

मेरे इसी दायित्व का निर्वहन है यह कविता । *

* * * आज केसरी होली है * * *
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आज केसरी होली है
मनभाते अब खेलो खेल
आज बड़ा सुभीता है

लेकिन उससे मत कहना
बच्चे भूखे हैं जिसके
जो खून के आंसू पीता है

आज केसरी होली है . . . . .

रेल चलेगी बंदूक की गोली
मिल-बैठ बतियाएंगे सब यार
हमने दुनिया को जीता है

उससे थोड़ा बचके निकलना
जिसके काँधे पत्नी का शव
युगों-सा इक-इक कोस जिसका बीता है

आज केसरी होली है . . . . .

घर-घर में शौच का आलय
सुअवसर दूर-दूर बतियाने का
खीसे खोंसा बैंक मीठा-मीठा चुभीता है

उनको भी भर देंगे सपनों से
जिनके सिरों पर छत नहीं
जिनका खाता रीता है

आज केसरी होली है . . . . .

हे माता हे माँ भारती
तेरा जाया तेरी बोली भूल गया
फिर भी जगता है और जीता है

छाती तेरी हग-हग के भर दी
खावे है अब यूरिया
बोतल का पानी पीता है

आज केसरी होली है . . . . .

लुटेरों के मानस-पुत्र सब खेत रहे
अब हम हैं हमारे अपने हैं
रण-क्षेत्र में अब कोई भालू है न चीता है

बुलबुल नहीं न चिड़िया हैं हम
नए यार बतावेंगे जग को
हम आम हैं या कि पपीता हैं

आज केसरी होली है . . . . . !

१३-३-२०१७ -वेदप्रकाश लाम्बा
०९४६६०-१७३१२

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