उम्मीद का टुकड़ा

उम्मीद का टुकड़ा

By | 2018-03-14T22:48:24+00:00 March 14th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

मैं उम्मीद का एक टुकड़ा हूँ

जबकि दिल से टूटा हूँ,फिर भी पूरा हूँ

तुम सम्हाल कर रखना मुझे

अगर टूटुगा तो बिखर जाऊँगा दिल में

तुम बहा कर आँखों से दिल को हल्का कर देना

अगर तेरे दिये आकार में साकार हो पाऊँगा

तो जगमगाऊँगा तेरी आँखों में

ये टूटने बनने का सिलसिला यूँही चलता रहेगा

जैसे सॉसें रुक रुक कर चलती हैं

और धड़कनें भी तो थमथम कर चलती हैं

जैसे दिन रात होते हैं

जैसे सावन,भादों,बसंत पतझड़ भी तो होते हैं

सब दन एक से कहाँ होते हैं

तुम कभी न छोड़ना मुझे

क्योंकी मैं जीने की उमंग हूँ

जिन्दगी की तरंग हूँ

मैं ही हूँ जो सपना दिखाती हूँ

और मैं ही किसी भी पल हौसला बन जाती हूँ

हाँ बस धैर्य रखना है तुम्हें

सजो कर रखना तुम मुझे दिल में, मनमें,

सपनों में,नज़रों में या अपनों में या सब में

जो भी जगह तुम्हें बहतर लगे,पर रखना जरूर!!

अगर मेरा अवशेष भी शेष रहेगा

तो वह अंकुरत हो तुम्हें फिर से जिवित कर देगा।।

— पारुल शर्मा

 

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लिखना मेरी रग रग में है

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