हे मानव तुम जैसा नहीं हूँ मैं

हे मानव तुम जैसा नहीं हूँ मैं

By | 2018-03-14T22:44:16+00:00 March 14th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

हे मानव में तुम्हारे जैसा नहीं हूँ

दो हाथ,दो पैर,आँख,व दिल वाला

फिर भी संवेदनाओं को समझता हूँ,महसूस करता हूँ,

माना पैसै नहीं कमाता न उगाता

पर धन,सम्पत्ति,संपदा से महत्वपूर्ण

धरती को संवाँरता हूँ,पर्यावरण को बनाता हूँ

जीवन व चेतना में संचार लाता हूँ

मुझे असहाय व तुक्ष समझ

तुम जो वन उपवन निरंतर काट रहे हो

अपने पाँव तले की जमी,

सर पे आँसमां और

ओर के पर्यावरण को उजाड़ रहे हो।

करोंड़ों सालों की मेहनत से धरती पर

जीवन का अस्तित्व मेरे कारण आया है।

धरती और मैंने ही  इसे जीवन उपयुक्त बनाया।

मैं धरती का रक्षक हूँ,जीवन का संरक्षक हूँ

फिर भी पतन देख रहा हूँ  जीवन का,धरती का

क्यों कि मैं असर्मथ हूँ,असहाय हूँ

सब कुछ आते हुए भी

कुछ भी न कर पाता हूँ!

क्यों कि मैं एक जगह खड़ा रहता हूँ,

और हूँ बिन पाँव,बिन हाथ,बीन आँख,बिन दिल-दिमाक का

और अंतत: काट दिया जाता हूँ तुम्हारे द्वारा

हे मानव तुम तो सक्षम हो

और इतने सक्षम होने के बाबजूद भी

धरती के उत्थान में योगदान न देकर

इसके अस्तित्व को मिटा रहे हो

हाँ मैं तुम जैसा नहीं हूँ,श्रेष्ठ!

पर जीवन का अक्स हूँ,

धरती की परझाई हूँ

— हाँ मैं पेड़ हूँ।

तुम मुझे काटकर खुद को काट रहे हो

खुद को मिटा रहे हो

अच्छा है, मैं तुम जैसा नहीं हूँ।

– पारुल शर्मा

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लिखना मेरी रग रग में है

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