सफेद दरख्त

सफेद दरख्त

By | 2018-03-14T22:41:37+00:00 March 14th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

सफेद दरखस्त अब उदास हैं

जिन परिंदों के घर बनाये थे

वो अपना आशियाना ले उड़ चले।

सफेद दरखस्त अब तन्हा हैं

करारे करारे हरे गुलाबी पत्ते जो झड़ गये

परिंदो के पर उनके हाथों से छूट गये।

सफेद दरखस्त अब लाचार हैं

छाव नहीं है उनके तले

अब परिंदों को वो बोझ लगने लगे।

सफेद दरखस्त अब असहाय हैं

बदन काँपता है जोड़ों में टीस हैं

अब वो परिंदों के लिए काम के नहीं रहे।

सफेद दरखस्त पहले ऐसे न थे

जब युवा थे, सपनों से भरपूर थे

रंग बिरंगी ख्वाहिशों से हरे-भरे,फूले-फले,थे।

आये जब परिंदे गर्भ और जीवन में

तो वो अपनी सुधबुध भूल गये

लगा उन्हें ये कि अमृत मिल गया उन्हें।

अपनी संतान पे कुर्बान कर दी दरखस्तों ने

सम्पत्ति,खुशी,लम्हें, सपने और ख्वाहिशें

धीरे-धीरे वो खाली और खोखले हो गये।

जरा भी हौले हौले जकड़ रही थी उनको

अंत: जर्जर हो

वो सफेद दरखस्त अब हो गये

उदास,तन्हा लाचार,असहाय,बेबस

क्योंकि वो अब बूढ़े हो गये

क्या इस लिए बेटों ने छोड़ दिया इन्हें।

निकाल फेंक दिया अपने घर से जीवन से

सफेद दरखस्तों को जाने कैसे

जो कभी उनके माँ-बाप हुआ करते थे।

उनके आदर्श,उनके परमात्मा,उनके जिन्ह,

ख्वाबों के मसीहा,सपने पूरे करने वाले

अब परिंदों के लिये सफेद दरखस्त पराये हो गये ।

हाँ सफेद दरखस्त अब   उदास,लाचार,बेबस,तन्हा हो गये हैं।

पारुल शर्मा

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लिखना मेरी रग रग में है

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