एक अधूरा सच

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एक अधूरा सच

एक अधूरा सच … ।

उफनती नदी से आवेग का स्वच्छंद प्रवाह भीतरी बंदिशों का त्याग कर अपनी उन्मुक्त दशा का आभास कराती खनकती मधुर हंसी की उन्मादित शीतलता देती वह छुईमुई सी नटखट अदा हृदय में घर कर गयी , मैंने जरा सचेत होते हुए पूछा – कितनी सटीक परिभाषा कर बैठी आप , बहुत कुछ बाकी रह जाता है उफान के बाद भी, अधिकतर वह जो जड है ठोस है वही तो अवशेष है उफान के बाद का , कि पहचान हो अतीत की, अन्यथा तो सब पल की खुराक बन जाता है, छीतर जाता है …? मधुलिका ने गहरी नजरो से मुझे देखा  और बोली – ” आप होश में होने का दावा कर सकते है, यदि हाँ तो प्रमाण दीजिए । ” मै सपकपा सा गया , अहसास हुआ विगत का ..नीरा झूठ और पाखंड से भरा अतीत,  केवल अज्ञात का दंभ ही तो जीया , एक पागलपन …एक सघन सच जिसमे कोई भान नही, और कई विगत के अनचाहे पल चलचित्र की तरह बेबूझ जिन्दगी की कहानी दोहराने लगे । हिम्मत कर मैंने कहा ” सुनो जीवन को इसी पक्ष से आंकना ठीक न होगा, कही कुछ सार्थक भी है चेतन भी है आप उस सत्य की उपेक्षा नही कर सकती ” मधुलिका मुस्कराने लगी और उसकी मुस्कराहट से मैं तिलमिला उठा , एक ठहाके भरी विमुक्त हंसी के बाद वह बोली ” आज हर आदमी बेहोशी में जी रहा है, चेतना लुप्त,  निष्प्रयोजन , निषेधात्मक जिन्दगी …कई हत्यायें , बलात्कार, और घृणित पाशविक कृत्य इसके उदाहरण है, सुनोगे घटना, जिसे आप नाम दे देना …. ।

मुख्य बाजार की घनी भीड से एक अजनबी पागल सा व्यक्ति मेरी तरफ एकाग्रता से बढता हैं और बिना कुछ बोले , अपने जेब से रूमाल निकाल कर मुझे देने को बढाता है, मैं डरी सहमी उसे लेने से मना कर देती हूँ … जानते हो , उसकी त्यौरियाँ चढ जाती है उसके दुसरे हाथ में लंबा फलकदार चाकू देखकर मेरे हाथ  अनायास रूमाल की तरफ बढते हैं और वह आदमी मीठी मुस्कान से देखता हुआ वहां से हट जाता है …।” बताओ तो जरा ..इसे क्या नाम दे ।”

मैं अवाक मौन व चिंतन में हूँ …….।

छगन लाल गर्ग “विज्ञ”!

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