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By | 2018-03-16T21:28:17+00:00 March 16th, 2018|Categories: लघुकथा|Tags: , , |0 Comments

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प्रभा अभी एक ही निवाला मुँह में ले पाया थी कि राकेश के कुछ शब्दों ने उसे झकझोर कर रख दिया। शादी के काफी महीनों बाद पहली बार राकेश उसे रेस्टोरेंट मे खाना खिलाने लाया था वो खासी उत्साहित थी और खुश भी।

पिंक कलर की साड़ी पर सिल्वर कलर की बहुत ही महीन ऐमब्रोइडी हो रही थी मैचिंग की बिंदीं, चूड़ी, टॉप्स, गले का सैट उसके ऊपर खूब फब रहा था। वो इक दम परी लग रही थी। रेस्टोरेंट की तीसरी सीट पर दोनों आमने सामने वाली चेयर पर बैठे हुए थे।

 

मैन्यू कार्ड हाथ में थमाते हुए राकेश ने ही तो प्रभा से खाना ऑर्डर करने को कहा था। वो खाने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसकी निगाहें बार बार बरबस ही राकेश पर जा टिकती थी और राकेश तो चौतरफा नजर लिये कभी रेस्टोरेंट की छत, कभी दीवार, कभी काउन्टर, तो कभी गेट, और तो कभी वहाँ आये अन्य लोगों को। उसको तो मानो प्रभा की मौजूदगी से कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। कि तभी खाने का इंतजार खत्म होता है खाना आता है। तब राकेश की नजऱ प्रभा पर पड़ती हैं प्रभा को कुछ गौर से देखने के बाद राकेश वह सवाल पूँछता है जिससे प्रभा सिहर जाती है राकेश कहता है कि- “तुमने तो मेरा पैसा देख कर ही मुझसे शादी की,तुम कितनी सैलफिस हो।”

 

प्रभा को पहले तो एक दम धक्का लगता है फिर वह उस दुनिया से बाहर आती है जिसमें कि वह खोई हुई थी रेस्तराँ के और भी लोगों की नजर अचानक ही प्रभा पर उसी सवाल के साथ पड़ जाती है। प्रभा अपने आप को सम्हालते हुए राकेश से कहती है—-“कि मेरी आपसे न तो लव मैरिज हुई है और ना ही मेरे कहने पर मेरी आपसे शादी हुई है। मेरी आपसे शादी तो मेरे माँ पापा की मर्जी से हुई है। और हर माँ पापा अपनी बेटी के लिये वही वर देखते हैं जो योग्य हो और जॉब करता हो। बेरोजगार और अयोग्य लड़के के घर वो जाते भी नहीं।”

 

प्रभा के जबाब के बाद राकेश के पास कुछ कहने को रहा ही नहीं राकेश सकपकाया सा खाने की तरफ देखने लगा और खाना खाने लगा। और प्रभा ने भी वह निवाला मुँह में लिया जो काफी देर से उनकी हाथों की अंगुलियों में दबा था पर अब खाने में वो स्वाद नहीं था जिस का कि प्रभा बेसब्री से इंतजार कर हरी थी। और अन्य लोगों को भी क्या मतलब सब अपना अपना खाना खाने लगे प्रभा की ओर से नजरें हटा कर। पर राकेश में कोई तब्दीली नहीं दिख रही थी वह फिर भी चौतरफा नजर लिये इधर उधर तकता हुआ खाना खा रहा था। प्रभा ने भी सोच विचार बंद किया और खाना खाने लगी।                                                                                                                                                                                                                                                                                              – पारुल शर्मा

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