निराशामयी मंज़र में अपनी ही आस्था पर सवाल

निराशामयी मंज़र में अपनी ही आस्था पर सवाल

कितना बेबस सा हो जाता है
उस वक़्त इंसान
जब वो चाहता कुछ और हा
मिलता कुछ और है
मांगता कुछ और है
और ईश्वर देता कुछ और है
तब उस निराशा के मंज़र में
मात्र एक ही विकल्प नज़र आता है
वो कोसता है उस परम सत्ता को
नकारता है उसके अस्तित्व को
डूब कर अपने ग़मों में
वेदनामय बना देता है जीवन को
कुछ हद तक कहें तो ये सही है
दिल को बहुत ठेस जो लगी है
आखिर
आस्था को उस रब ने ही तोडा है
जिससे ये सब सृष्टि बनी है
सब कुछ यदि है पूर्वनिर्धारित
तो क्यों उसके अस्तित्त्व पर विश्वास करें
क्यों उसके सेवा भजन में
अपना वक़्त हम बर्बाद करें
होगा तो वही जो किस्मत में है
तो क्यों उस रब से फ़रियाद करें
वर्तमान में तो उसके अस्तित्व पर
एक प्रश्न चिह्न ही नजर आता है
क्योंकि
वो दे रहा है उनको ही
जहाँ सब भरा ही नज़र आता है
जिनके जीवन में खालीपन है
वह तो खाली ही रह जाता है
जो हाथ फैलाये खड़ा रहता है
वो हाथ फैलाये ही रह जाता है
और किसी किसी को बिना मांगे यहाँ
बहुत कुछ मिल जाता है

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प्राध्यापक(हिंदी साहित्य)

2 Comments

  1. saurabh_1 March 18, 2018 at 2:07 am

    सुन्दर!

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  2. धन्यवाद

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