हिंदी साहित्य का सरलतम इतिहास

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हिंदी साहित्य का सरलतम इतिहास

हिंदी साहित्य का इतिहास
असीम है, अतीव है
आदि को कहा है आदिकाल
वीरगाथाएं जिसमे वर्णित है
चंद, केदार, विद्यापति संग
नरपति के समाये गीत हैं
वीर रस तो है प्रधान
पर श्रृंगार भी सम्मिलित है
भक्तिकाल में भक्ति है
निर्गुण पर सगुण की जीत है
ज्ञान-प्रेम और राम-कृष्ण में
बहता भक्ति का संगीत है
प्रेममार्गी जायसी हैं तो
ज्ञानमार्ग कबीर द्वारा प्रवर्तित है
तुलसी के राम हैं तो
कृष्ण सूर द्वारा अवतरित हैं
शांत रस की धारा है
वात्सल्य के भी कवित्त हैं
पूरी की पूरी सृष्टि केवल
एक परमतत्व से निर्मित है
नियमों से बंधा है रीतिकाल
लक्षण ग्रन्थ लिखने की रीत है
पर रीतिमुक्त कवि भी हैं
जिनमे स्वच्छन्दता अपरिमित है
केशव, मणि, देव, दास आदि
सब रीतिबद्ध से संबंधित हैं
रीतिसिद्ध तो बस बिहारी हैं
जिनकी प्रसिद्धि सर्वविदित है
घनानंद, बोधा, आलम ,ठाकुर से
रीतिमुक्त काव्य रचित है
उनके काव्य की प्रेरणा
कुछ और नहीं उनकी प्रीत है
अंत में आता है आधुनिककाल
जो कई वादों और युगों से सज्जित है
पुनर्जागरण का दौर है ये
देशप्रेम के भाव ध्वनित है
भारतेंदु हैं…..द्विवेदी हैं
जिनके नाम से युग अंकित है
एक हैं नाटक विधा में श्रेष्ठ है
एक खड़ी बोली के पंडित है
प्रसाद, महादेवी, पन्त, निराला
चारो छायावाद की भीत हैं
इनके काव्य में प्रकृति प्रेम है
तो स्वाधीन चेतना भे संचित है
प्रगतिवाद और प्रयोगवाद में
चहुँ और यथार्थवाद चित्रित है
नयी कविता में तो शामिल
नए बिम्ब और नए प्रतीक हैं
और भी अनेक विधाएं हाँ
इस काल में सब समाहित है
उपन्यास, नाटक, कहानी है तो
निबन्ध, आलोचना, रेखाचित्र है
एक और प्रेमचन्द, प्रसाद हैं तो
आ.शुक्ल और नगेन्द्र का भी कृतित्व है
हिंदी साहित्य का ये इतिहास
ऐसे अनेक विद्वानों, आचार्यों से
दिन-प्रतिदिन संवर्धित है

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प्राध्यापक(हिंदी साहित्य)

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