तुमने सोचा है कभी

Home » तुमने सोचा है कभी

तुमने सोचा है कभी

                               हे   मानव !

                               तुमने  सोचा  है  कभी ,

                               तुम पूर्णत:  हो नारी पर निर्भर .

                               जन्म से  मृत्यु तक  तुम्हारे

                              जीवन- सञ्चालन में है  वो  तत्पर.

 

सर्वप्रथम   है  तुम्हारी  जननी  ,

                               जिसने  तुम्हें   जन्म दिया .

                              भटक  रहे होते   तुम  अंधेरों में,

तुम्हें  धरती पर लाकर जीवन दिया.

तुम्हारा पालन-पोषण किया ,और

तुम्हें  शिक्षा व् संस्कार देकर इंसान बनाया.

तुमने  कामयाबी की  सीढियाँ  चढ़ी हैं तो ,

केवल  अपनी  जननी  के दम  पर.

जननी  की गोद  से  तुम  उतरे  तो ,

तुम्हें  गोद मिली  धरती माता की .

तुम्हारे  ठुमकने से लेकर  दौड़ने तक ,

जिसकी  मिटटी में खेलकर बड़े हुए ,

और अंत में  उसी मिटटी  में  मिलने तक .

जीवन  की  ऊँचे -निचे  रास्तों  से  परिचय

करवाती इस    धरती माता का गुण-गान करो  ,

तुमने  जीवन-संघर्षों  से  उबरना सीखा

तो  मात्र  इस भूमि  पर .

धरती  पर  तुम   जब  आये ,

प्रकृति  माँ ने  तुम्हें  पाला .

अपने  फल,अनाज , व्  वनस्पतिओं ,

व्   तुम्हारा  पोषण किया .

और जब तुम बीमार हुए तो अपनी,

औषिधीयों  से तुम्हारा उपचार किया.

अपने  प्यारे-प्यारे  रंगीन फूलों की खुशबू से ,

अपने  घने वृक्षों  की  छाँव से ,

तुम्हें आनंदित किया.

अपने  विशाल  पर्वतों से  सरंक्षित  किया ,

आसमान सी  छत दी आश्रय को ,

तो   ताज़ी हवा दी तुम्हारी  प्राण-वायु को.

तुम्हारी  जीवन्तता हेतु .

सोचो   कितने  उपकार है इस

प्रकृति  माता   के तुम पर.

यह नदियाँ  ,यह सागर  भी  हैं

तुम्हारे  परम-पुजनिये अभिवाहक.

सागर  देता है  अमूल्य रत्न ,और

हर क्षण बदलता मौसम.

ग्रीष्म ,शीत ,  वर्षा  ,पतझड़ और बहार ,

ताकि  प्रत्येक  से  सामजस्य  बिठाना

जीवन में  सीखो तुम .

गंगा मईया व्  अन्य नदियाँ  तुम्हारी

बुझाती है प्यास और  प्रदान  करती है जल .

और चलाती है जीवन चर्या  को.

मगर   इस पर  केवल तुम्हारा अधिकार नहीं ,

यह  बहती है  धरती  पर प्रत्येक  जिव-जंतु ,

प्राणियों ,वृक्षों व् वनस्पतियों  की  प्यास बुझाने

व्  उनकी  जीवन-रक्षा को.

फिर  क्यों प्रदुषण , और गंदगी  से  दाग  लगाया

तुमने   इस  जीवन-दायिनी ,मुक्तिदायिनी

मातायों     की  निर्मल  ,पवित्र  ,शुद्ध ,धवल

धाराओं    चुनर पर .

जननी   के  अतिरिक्त  तुमने

दुग्ध पान किया  एक और माता  का .

भोली ,मासूम  मगर बेजुबान गोऊ  माता का.

अपनी जीतेजी तो क्या ,

अपनी  मृत्यु के बाद भी जो

निस्वार्थ सेवा करती , अपना जीवन  होम करती.

एहसान  मानो   इस  करुणामयी   माता का.

तुम्हारे किसी भी  आचरण  से जो  द्वेष नहीं करती .

तुम चाहे  जैसे रखो ,कभी शिकायत  नहीं करती .

तुम तो हो  स्वार्थी ,स्वार्थ पूरा होने जाने पर

चाहे इसे दुत्कार दो .

या  चंद   पैसों   की खातिर इसे

कसाई को सौंप  दो .

फिर  भी  आह नहीं  करती ,

तुम्हें श्राप  भी नहीं देती .

ऐसी महान गोऊ  माता ,

और  ऐसे  तुम अत्याचारी .

लानत है तुम पर!

 

 

तुम   सुनो  हे मानव ,   ज़रा तोलो अपना ज़मीर .

इतनी  माताओं   के उपकारों का तुम है ऋण ,

फिर तुम कहाँ  के  स्वामी और कैसे  अमीर?

तुमने  किया  है  इन प्रत्येक  माताओं  के साथ ,

अत्यचार ,अनाचार और  व्यभिचार .

नारी  ही हैं  यह सब , नारी  का भी  .

तुमने किया जीना   दुश्वार .

कल्पना करो  अपने  मन-मस्तिष्क  में,

यदि  इन सभी  नारीयों  का सब्र  का बांध टूटा ,

तो क्या होगा?

इनकी  तेजस्वी  ,प्रचंड  शक्तियों  का  हो जाये विलय

तो क्या होगा. ?

तो खबरदार !  तुम्हारे  जीवन में आ सकता है   प्रलय.

इसीलिए कसकर  लगाम  लगाओ समय   रहते ,

अपने  लालच , नफरत , स्वार्थपरता , छल-कपट ,

हिंसा व्    दुष्टता  पर.

 

सुनो  से मानव  !  अपने  अभिमान -वश ,

भले ही तुम मानो या न  मानो .

मगर  तुम हो  सर्वथा ,पूर्णत;  नारी पर निर्भर.

Comments

comments

No votes yet.
Please wait...
Spread the love
  • 22
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    22
    Shares
संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

Leave A Comment