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By | 2018-03-20T19:29:13+00:00 March 20th, 2018|Categories: कहानी|Tags: , , |0 Comments

“रोहन कल सुबह रक्षक के स्कूल चलना है। दस बजे स्कूल चलना है।”

फोन पर रिया की यह बात सुन कर रोहन झल्ला पड़ा। “इतनी सी बात के लिए फोन किया। घर पर नही कह सकती यह बात। जरूरी मीटिंग हो रही है और तुमको स्कूल की पड़ी है।”

“घर पर मिलते कहां हो? दो दिन से घर नही आये। कौन सी जरूरी मीटिंग हो रही है दो दिन से? तुम अभी घर आओ नही तो खैर नही। मैं भैया के साथ ऑफिस आती हूं।”

इतना सुन रोहन का इश्क का भूत उतर गया और अपनी महिला मित्र मोना की बाहों से निकल कर कपड़े पहनने लगा।

“क्या हुआ डार्लिंग?”

“साली कम्बखत ने प्यार का मूड ही बिगाड़ दिया। कुछ इंतजाम करना होगा इसका।”

“मुझे छोड़ कर कहां जा रहे हो प्रेम की बेला में?”

“घर जा रहा हूं। नही गया तो ऑफिस पहुंच जाएगी। आफत आ जाएगी। मैं तुम्हारे साथ हूं। ऑफिस का चौकीदार बक देगा मैं छ बजे ऑफिस से निकल जाता हूं।”

 

रोहन औऱ रिया के विवाह को सात वर्ष हो गए और पांच वर्ष का रक्षक प्रथम कक्षा में पढ़ रहा है। कल सुबह दस बजे स्कूल में टीचर पैरेंट मीटिंग है जिसमे जाने के लिए रिया ने रोहन को फोन किया क्योंकि दो दिन से वह घर नही आया था। रसिक रोहन का दिल अब अपनी सेक्रेटरी मोना पर आ गया औऱ उसके साथ समय बिताने लगा। रात का एक बजे रोहन घर पहुंचा और रिया पर बिगड़ पड़ा।

“कौन सी आफत आ गई जो मुझे बुलाया?”

“एक तो शराब पी कर आए हो वो भी दो दिन बाद और झगड़ रहे हो। कल रक्षक की टीचर पैरेंट मीटिंग हैं। स्कूल जाना जरूरी है।”

“तुम जाओ मुझे क्यों बुलाया?”

“मां-बाप दोनों का मीटिंग में जाना जरूरी है।”

इस बात पर रोहन और रिया का झगड़ा हो गया। शोर सुन कर रक्षक उठ गया। रिया और रोहन में हाथापाई होने लगी। सहमा मासूम रक्षक कुछ देर तक मां-बाप की लड़ाई देखता रहा लेकिन बोल पड़ा।

“पापा मम्मी को क्यों मार रहे हो?”

इतना सुन रोहन ने रक्षक को पीट दिया। “दो फुट का पिद्दी सा है नही, बाप से ज़बान लड़ाता है।” कह कर रोहन ने रक्षक और रिया दोनों को धक्का दिया। रिया और रक्षक दोनों गिर पड़े। रक्षक रोने लगा। रक्षक के रोने की आवाज और रिया-रोहन के बढ़ते झगड़े और चिल्लाने से रोहन के माता-पिता ने दोनों के झगड़े को शांत करने की कोशिश की पर असफल रहे। रोहन और रिया का झगड़ा बढ़ता गया। हाथापाई से दोनों के कपड़े फट गए। रक्षक को फिर धक्का लगा और वह गिर गया। रक्षक को दादा-दादी ने उठाया और अपने कमरे में ले गए।

 

रक्षक के प्रश्नों का उसके दादा-दादी के पास कोई भी उत्तर नही था कि उसके मां-बाप क्यों लड़ रहे हैं। पांच वर्ष की उम्र में बच्चे सब कुछ समझने लगते हैं। रोहन और रिया का झगड़ा पिछले एक वर्ष से अक्सर हो रहा था। रक्षक झगड़ा और मारपीट देख कर सहम गया। जो रक्षक एक वर्ष पहले तक बातूनी और खेल में मस्त रहता था आज सहमा हुआ गुमसुम और टीवी के आगे खोया सा रहने लगा।

रात को दादा-दादी ने रक्षक को अपने पास सुलाया। रिया और रोहन का झगड़ा दोनों के थक कर चूर होने पर बंद हुआ।

 

सुबह रिया रोहन से कुछ नही बोली। रक्षक के साथ स्कूल गई। रक्षक की टीचर ने रिया को बताया कि रक्षक गुमसुम रहता है। जहां सभी बच्चे शरारत में व्यस्त रहते हैं रक्षक अकेला शून्य में ताकता हुआ अपने आप बातें करता है। इस छोटी सी पांच वर्ष की उम्र में गुमसुम रहना और अपने से बात करना बच्चों के हित में नही है। रिया चुपचाप सुनती रही। घर आकर देखा रोहन जा चुका था।

 

रोहन का घर से गायब होने के पीछे उसका रसिक स्वभाव था। आजकल उसके संबंध मोना के साथ गहरे हो गए। रिया के कान में रक्षक की टीचर के स्वर गूंज रहे थे। “रक्षक स्कूल में गुमसुम अपने से बातें करता है।” घर पर भी उसका यही स्वभाव रिया देखने लगी। रोहन से झगड़ने के पश्चात गुस्सा रक्षक पर उतरता था। बेकसूर रक्षक की पिटाई हो जाती।

 

अपने वैवाहिक जीवन को पटरी पर लाकर रक्षक का भविष्य उज्ज्वल करना है परंतु कैसे? असफल रिया ने रोहन की जासूसी की और वह मोना तक पहुंचने में सफल हुई। मोना के नशे में धुत रोहन रिया की जिंदगी में फिर से आने को राजी तो नही था लेकिन परिवार के दबाव में मोना का साथ छोड़ना पड़ा फिर भी रिया के साथ रोहन के रसिक स्वभाव के कारण तालमेल नही बैठा। मोना उसकी दुनिया से दूर हुई और थोड़े दिन बाद सोना उसकी जिंदगी में आई। अब रिया ने रोहन का घर छोड़ दिया। रिया थोड़े दिन अपने मायके रही। यह एक विडंबना ही है कि विवाह के बाद धीरे-धीरे मायका छूट ही जाता है। भाई-भाभियों के धीरे-धीरे होते रूखे व्यवहार से रिया ने नौकरी कर ली औऱ किराये के कमरे में रहने लगी।

 

सुबह रक्षक को स्कूल छोड़ने के बाद ऑफिस जाती। दोपहर का खाना बना कर रख जाती। कमरे की एक चाबी रक्षक के पास होती। स्कूल से आने के बाद रक्षक ओवन में खाना गरम करके खाता। उसकी मम्मी अकेली क्यों रहती है? ऐसे प्रश्नों का उत्तर उसके पास नही था और वह अकेला कमरे में बंद हो गुमसुम दीवारें देखता रहता।

रिया ने उसके हाथ में रंग और ब्रश थमा दिए। रक्षक रंगों के साथ खेलने लगा। चित्रकारी में डूब कर रक्षक ने कैनवास पर अपनी सोच से रंग भर अपनी तन्हाई दूर की। रिया रक्षक को सदा प्रेरित करती। स्कूल की ड्राइंग कॉम्पिटिशन में प्रथम स्थान आया। अंतर-राजकीय स्कूल कॉम्पिटिशन में रक्षक ने फिर प्रथम स्थान हासिल किया। उसकी चित्रकारी में नारी की वेदना और बच्चों की उड़ान होती। अपने बचपन मे देखे झगड़े उसके मस्तिष्क के किसी कोने में अंकित थे जो चित्रकारी में उभर कर आते। गंभीर विषयों पर छोटे बालक की चित्रकारी ने सबको आकर्षित और प्रभावित किया और कई पुरस्कार प्राप्त किए। रक्षक की सफलता से रिया के घाव भर दिए।

 

समय ने घाव भर दिये पर उनकी याद नही मिटी। रक्षक चित्रकारी में उज्जवल भविष्य देख रहा था। दिल्ली विश्वविधालय के स्कूल ऑफ फाइन आर्ट्स में एडमिशन से उसकी मनोकामना पूरी हुई। एडमिशन के पश्चात रक्षक ने मां से कहा।

“मम्मी मुझे रोहन के ऑफिस ले चलो।”

“रोहन? कौन रोहन?” रिया ने हैरानी से पूछा।

“जो आपको पिटता था। मुझे मारता था।”

“वैसे वो तुम्हारे पिता हैं। मैंने आजतक तलाक नही लिया है।”

“उससे क्या फर्क पड़ता है। रहती भी नही हो उसके साथ। पता नही किसके साथ रहता होगा।”

दोनों सीधे रोहन के ऑफिस में पहुंचे। बेधड़क रोहन के ऑफिस में दाखिल हुए। रसिक रोहन एक युवती के साथ प्रेम की पींगे बढ़ा रहा था। रिया को अचानक देख कर उसके होश उड़ गए। रंग फीका पड़ गया।

“तुम।”

“हां रोहन मैं। इससे मिलो। तुम्हारा पुत्र रक्षक।”

रक्षक ने कुछ नही कहा। उसने एक पेंटिंग रोहन को भेंट की। पेंटिंग में एक पुरूष एक स्त्री की पिटाई कर रहा था।

पेंटिंग देकर रक्षक ऑफिस से बाहर आ गया। रिया के मुख पर आज आत्मविश्वास वाली मुस्कान थी क्योंकि रक्षक आज पहली बार खुलकर खिलखिला रहा था।

 

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कहानियाँ लिखना शौक है। फुर्सत के पलों में शब्दों को जोडता और मिलाता हूं।

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