ज़िद और अदब

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ज़िद और अदब

By | 2018-03-22T22:58:45+00:00 March 22nd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |2 Comments
  1. वो तेरी तरसी निगाहों का,
    वो हर बार का उलाहना ।
    और धक् से मेरी धड़कन का,
    यूँ आने से रुक जाना ।।
    पास आने की तेरी शिद्दत का
    मुझे झूठ-मूठ सताना ।।
    और मेरा वही मान कर भी
    न मानने का रवैया मनमाना ।।
    तेवर में भर कर गुस्सा,
    यूँ तेरा वहीं रुक जाना ।।
    मना लूं तुम्हें लगा कर गले,
    पर मेरा तुझे यूँ झूठा खपाना ।।
    नयनों की कोर से हुई शरारत का,
    सारा राज़ खोल जाना ।।
    पर तुझ मासूम का एक और पत्र प्रार्थना का,
    मुझे निवेदित कर जाना ।।
    मुस्काना, लजाना, मेरा आगे बढ़ कर,
    फिर रुक जाना ।।
    पर तेरे छूने की अदब का
    मुझ पर बादल बन छा जाना ।।
    और मेरे मोम के किले सी ज़िद का,
    ढह जाना – ढह जाना ।।।।

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

2 Comments

  1. Brij mohan March 25, 2018 at 12:39 pm

    Gagare mein sagar

    Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
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  2. Mukta Tripathi April 3, 2018 at 11:25 pm

    अति धन्यवाद

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