अफ़सोस

अफ़सोस

By | 2018-03-22T22:54:00+00:00 March 22nd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

सब कुछ खाक सा था
ऐसा लोगों ने कहा
पर हमें तो खाक
दिखा ही नहीं वहां ,
उनकी उम्र ही क्या थी
महज पांच- से -छः साल
उनके हाथ अनवरत चल रहे थे
साथ में एक काफ़िला
सबका एक ही लक्ष्य ,
कि बोरे भर घास जुटाना है
नन्हें पाँव सबके पानी में डूबे
एक जुकाम से ग्रसित भी
लक्ष्य के प्रति अडिग
पर,
सब अनिश्चितता मे कहीं गुम हीरे
उनकी गलती नहीं
उनके हालात ऐसे हैं की जहाँ
हाथों में किताब,कलम और खिलौने होने चाहिए ,
वहां हंसिया ….
-कृष्ण कुमार भारती

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