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By | 2018-03-22T21:54:46+00:00 March 22nd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

आज गुम शुम सा है हर कोइ
खाली पड़ा है अखबार
या खत्म हो गया संसार
आज गुम शुम सा है हर कोइ
चोर, भ्रषट् ,छल , कपट
सब चौंकन्ने कि कहीं सबकी
नजर मुझे खत्म करने पर तो नहीं
आज गुम शुम सा है हर कोइ
शायद एक बड़ी क्रांति
जो कभी नहीं हुइ हो
सबके अंदर से उठी थी एक विश्वास,
जो पराकाष्ठा पर पहुंची थी कि
“सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय “|||
– कृष्ण कुमार भारती

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