किसान और नया वर्ष

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किसान और नया वर्ष

किसान और नया वर्ष

हम अन्न देव हैं हम किसान हैं
अन्न उगाकर दुनिया को भोजन देते हैं
पर सच है…
खुद आधे दिन बिन खाये ही सोते हैं
इस प्रतिफल के बदले हमको हेय निगाहों से देखा जाता है
हम बाज़ारो में जाते है तो
चीजों के ऊँचे दाम बताये जाते है
उस पर भी कितने टैक्स लगाए जाते हैं
जब खून कमाई की मेहनत से अन्न उगाकर

हम बेचने बाज़ारों में जाते हैं तो
कौड़ी के भाव मोल लगाए जाते हैं
फिर भी
कुछ आशाओं में बंध कर तन को जलाना होता है
वर्षा हो या सर्दी हो चाहे कितनी भी हो गर्मी
हर मौसम से लड़ना होता है
हर मौसम में हर पल हम अपना कर्म निभाते हैं
रातों -दिन मेहनत कर खाने को अन्न उगाते हैं
सालों की गई मेहनत का प्रतिफल जब पाते हैं
हाँ अन्न उगा कर तब हम घर लाते हैं
अब होंगी पूरी बच्चों की कुछ अपनी अभिलाषाएँ
हम किसान ये सोंच के हर्ष मनाते हैं
हम किसान हैं इसीलिए

चैत्र माह को नया साल मानते हैं…….

सुबोध पटेल उर्फ सुभाष

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