अखबारी सम्मान

Home » अखबारी सम्मान

अखबारी सम्मान

By | 2018-03-30T08:50:43+00:00 March 30th, 2018|Categories: लघुकथा|Tags: , , |0 Comments

||अखबारी सम्मान|| लघुकथा

 

लगातार बारिश की वजह से अखबार भीगने का खतरा बढ चुका था, और पंडित जी चिंतित हो उठे थे, राजधानी के समाचार पत्रो का बडा सा पेकेट रिक्शे की फटी फटाई दरारो से पूरा भीग गया था, और गांव था कि  अभी तक दूर था अचकचा कर रिक्शे वाले पर गरजे ” तेरी गरीबी कब जाएगी , रिक्शे पर नया टाट डलवाना चाहिए, तुझे यात्रियों के कीमती सामान की कुछ समझ है ? ” रिक्शा चालक चुप रहा तो पंडित  जी भड़के  ” बहरे हो क्या?  मै कुछ कह रहा हूँ तुम्हे ? ” वह विनम्रता से बोला ” साहब ! मंहगाई है तेल की कीमत ही पूरी नही पडती , कुछ बचत हो तो नया सुझे ! सवारी उसी भाडे मे सभी सुविधा चाहती है, यह कैसे संभव है? ,” पंडित  जी का मन कड़वा हो चुका था, वे घृणित दृष्टि से देखते हुए बोले ” तुम ड्राइवर लोग बदमाश हो , मालिक के पैसे हडप जाते हो , और गजब का अभिनय कर लेते हो ! ” इस बार रिक्शा चालक ने उडती नजरो से पंडित  जी को देखा , सूट बूट का पोस्टरनुमा शरीर, पर माथे पर तिलक जडा हुआ , ड्राइवर के होठो पर मुस्कान थिरक उठी “पर बाबू जी …रिक्शा तो मेरा ही है, मै ही मालिक भी , और मै ही नौकर भी .. । ” पंडित  जी ठगे से देखते रहे और बोले ” तो क्या तुम स्वर्ण हो ? ” ड्राइवर ने गंभीरता से कहा ” नही ।” अब पंडित  जी ने आँखे फेर ली और बैचेनी से आगे के रास्ते को पार करती रफ्तार का जायजा लेने लगे , उन्हे चिंता इस बात की थी कि कही पानी की लापरवाही से अखबार मे उनको प्राप्त सम्मान की तस्वीर व खबर न भीग जाए , और अगर यह हुआ तो मोबाइल की फोटो आज सुबह ही डिलीट हो चुकी है और सम्मान के ओहदे की चमक से अपने कविपन की श्रेष्ठता के बखान का प्रमाण मिट जाएगा … और गांव मे अपने पढे लिखे दोस्तो और प्रतिष्ठो को बताना है अपनी विद्ववता का प्रमाण , और मूसलाधार पानी से  वे स्वयं और सम्मान दोनो धूल रहे है||अखबारी सम्मान|| लघुकथा

 

लगातार बारिश की वजह से अखबार भीगने का खतरा बढ चुका था, और पंडित जी चिंतित हो उठे थे, राजधानी के समाचार पत्रो का बडा सा पेकेट रिक्शे की फटी फटाई दरारो से पूरा भीग गया था, और गांव था कि  अभी तक दूर था अचकचा कर रिक्शे वाले पर गरजे ” तेरी गरीबी कब जाएगी , रिक्शे पर नया टाट डलवाना चाहिए, तुझे यात्रियों के कीमती सामान की कुछ समझ है ? ” रिक्शा चालक चुप रहा तो पंडित  जी भड़के  ” बहरे हो क्या?  मै कुछ कह रहा हूँ तुम्हे ? ” वह विनम्रता से बोला ” साहब ! मंहगाई है तेल की कीमत ही पूरी नही पडती , कुछ बचत हो तो नया सुझे ! सवारी उसी भाडे मे सभी सुविधा चाहती है, यह कैसे संभव है? ,” पंडित  जी का मन कड़वा हो चुका था, वे घृणित दृष्टि से देखते हुए बोले ” तुम ड्राइवर लोग बदमाश हो , मालिक के पैसे हडप जाते हो , और गजब का अभिनय कर लेते हो ! ” इस बार रिक्शा चालक ने उडती नजरो से पंडित  जी को देखा , सूट बूट का पोस्टरनुमा शरीर, पर माथे पर तिलक जडा हुआ , ड्राइवर के होठो पर मुस्कान थिरक उठी “पर बाबू जी …रिक्शा तो मेरा ही है, मै ही मालिक भी , और मै ही नौकर भी .. । ” पंडित  जी ठगे से देखते रहे और बोले ” तो क्या तुम स्वर्ण हो ? ” ड्राइवर ने गंभीरता से कहा ” नही ।” अब पंडित  जी ने आँखे फेर ली और बैचेनी से आगे के रास्ते को पार करती रफ्तार का जायजा लेने लगे , उन्हे चिंता इस बात की थी कि कही पानी की लापरवाही से अखबार मे उनको प्राप्त सम्मान की तस्वीर व खबर न भीग जाए , और अगर यह हुआ तो मोबाइल की फोटो आज सुबह ही डिलीट हो चुकी है और सम्मान के ओहदे की चमक से अपने कविपन की श्रेष्ठता के बखान का प्रमाण मिट जाएगा … और गांव मे अपने पढे लिखे दोस्तो और प्रतिष्ठो को बताना है अपनी विद्ववता का प्रमाण , और मूसलाधार पानी से  वे स्वयं और सम्मान दोनो धूल रहे है ,सघन चिंता से आये चेहरे का पसीना भी अखबार मे छपे सम्मान को बरसात की बूँदों मे घुल मिलकर मिटाने पर तुला हुआ था …..।।

 

छगन लाल गर्ग विज्ञ!

Comments

comments

Rating: 1.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 3
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  • 1
  •  
  •  
  •  
    4
    Shares

About the Author:

Leave A Comment