खनक

खनक

By | 2018-03-30T21:55:54+00:00 March 30th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

खनक जो मन को भाये
जो नींदे चुराए

श्रृंगार का भी एक रूप
प्रेम की है प्रतिक
सोलह श्रृंगार इस के बिन अधूरे
इसके आते ही होते पूरे

इस की छनक में है एक राग
कवि का श्रृंगार रस इस बिन अधूरा
दुल्हन का ये श्रृंगार करदे पूरा

रूप अनेक अर्थ भी अनेक
पायल पाजेब या हो नूपुर
सबके मन को भाये
श्रृंगार में चारचांद लगाए

शालिनी जैन

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